मुक्तक/दोहा

जीवन जीना इस तरह

करते केवल कर्म हैं, नहीं चाहिए ताज।
कल की चिंता ना करें, जीते हैं बस आज।।
जीवन खुली किताब है, ना है कोई राज।
आगा-पीछा छोड़ कर, जीते हैं बस आज।।
लुटने का ही शौक है, नहीं चाहते लूट।
हमें साथ की चाह थी, तुमने चुन ली सूट।।
बसने की ना चाह है, चाहत नहीं मकान।
हमने जी ली राह है, आहत नहीं दुकान।।
साथी तो सब जात हैं, सबकी अपनी राह।
दुख भी, सुख ही देत हैं, निकले ना अब आह।।
ना चाहत है भीड़ की, एकाकी ही ठीक।
अपनी धुन में मग्न हैं, अपनी ही है लीक।।
ना मंदिर से बैर है, ना मस्जिद से प्यार।
जो दिल में है सत्य बस, वह ही है करतार।।
कांधे पर ना बोझ है, दिल की अपनी चाल।
जितना कम सामान है, उतना ही कम जाल।।
बिना थके हम चलत हैं, चलते हैं दिन-रात।
मंजिल का ना मोह है, मुरझाता ना गात।।
चाह नहीं है मान की, ना गम है अपमान।
जो है, उसी में मस्त हैं, अपना है ये गान।।
रोटी जितनी चाहिए, उतना ही है नीर।
प्यास बुझी बस, ठीक है, नहीं चाहिए खीर।।
दुनिया भागे दौड़ में, हम बैठे हैं शांत।
कर्म की चादर ओढ़ के, मन में है एकांत।।
जेब भले खाली रहे, दिल पूरित हो नेह।
सोच हमारी महल है, चाह झोपड़ी गेह।।
ताना कोई मारता, हम हंस देते टाल।
जो अपना समझा नहीं, उसका कैसा हाल ।।
राष्ट्रप्रेमी कह रहा, सुनो,यही है सार।
जीवन जीना इस तरह, जैसे बहे बयार।।

डॉ. संतोष गौड़ राष्ट्रप्रेमी

जवाहर नवोदय विद्यालय, मुरादाबाद , में प्राचार्य के रूप में कार्यरत। दस पुस्तकें प्रकाशित। rashtrapremi.com, www.rashtrapremi.in मेरी ई-बुक चिंता छोड़ो-सुख से नाता जोड़ो शिक्षक बनें-जग गढ़ें(करियर केन्द्रित मार्गदर्शिका) आधुनिक संदर्भ में(निबन्ध संग्रह) पापा, मैं तुम्हारे पास आऊंगा प्रेरणा से पराजिता तक(कहानी संग्रह) सफ़लता का राज़ समय की एजेंसी दोहा सहस्रावली(1111 दोहे) बता देंगे जमाने को(काव्य संग्रह) मौत से जिजीविषा तक(काव्य संग्रह) समर्पण(काव्य संग्रह)

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