कहानी

कहानी – एक दुल्हन के आँसू

शादी के सात दिन बीत चुके थे, लेकिन घर के आँगन में अभी भी हल्दी और गेंदे के फूलों की मिलीजुली महक तैर रही थी। निधि के हाथों पर रची मेहंदी का रंग अब गहरा होकर धीरे धीरे उतरने लगा था। वह जब भी अपने हाथों को देखती, उसे अपनी माँ की याद आ जाती। विदाई के वक्त माँ ने एक लाल रंग का मखमली डिब्बा उसके हाथों में सौंपते हुए भर्राए गले से कहा था कि ये गहने उसकी नानी के हैं और कुछ उसकी माँ के हैं। माँ ने यह भी कहा था कि अब ये सब निधि के हैं और उसे इन्हें बहुत सँभालकर रखना है क्योंकि ये सिर्फ सोने के टुकड़े नहीं बल्कि उनके परिवार की इज्जत और पीढ़ियों का आशीर्वाद हैं। निधि ने नई नवेली दुल्हन होने की झिझक के कारण अपने ससुर जी से तिजोरी की चाबी नहीं माँगी थी। उसने सोचा कि अभी कुछ दिन वह उन गहनों को अपने कमरे की अलमारी में ही सुरक्षित रख लेगी।

लेकिन नियति को कुछ और ही मंजूर था। उसी रात करीब दो बजे मोहल्ले की बत्ती गुल थी। चारों तरफ सन्नाटा पसरा था। तभी एक पुरानी मोटरसाइकिल पर दो लड़के आए। उन्होंने बड़ी आसानी से घर की पिछली दीवार फाँदी और खिड़की की ढीली कुंडी खोलकर अंदर घुस गए। अंधेरे में टटोलते हुए उनके हाथ वह अलमारी लगी। उन्होंने उसमें से एक भारी काला थैला निकाला और चुपचाप उसी रास्ते से फरार हो गए। उन्हें बिल्कुल भी अंदाजा नहीं था कि उस थैले के अंदर क्या रखा है।

अगली सुबह जब निधि ने कोई सामान निकालने के लिए अलमारी खोली, तो उसके पैरों तले से जमीन खिसक गई। वह काला थैला वहाँ नहीं था। उस थैले में बीस लाख से भी ज्यादा कीमत के आभूषण थे। उसमें नानी का पुराना पुश्तैनी हार, माँ की शादी की चूड़ियाँ, ससुराल से मुँह दिखाई में मिला रानी हार और सबसे कीमती वह सोने का छोटा सा टीका था जिसे निधि के पिता ने अपनी पहली तनख्वाह से बहुत अरमानों के साथ बनवाया था। घर में कोहराम मच गया। पुलिस बुलाई गई और रिपोर्ट दर्ज हुई। सास ने सीधे तौर पर तो कुछ नहीं कहा, लेकिन रसोई में बर्तन जोर जोर से पटककर अपनी नाराजगी जता दी। ससुर जी ने भी सबके सामने कह दिया कि नई बहू से इतनी बड़ी लापरवाही कैसे हो गई। निधि का पति अमन बहुत व्यावहारिक इंसान था। उसने निधि को समझाते हुए कहा कि वह परेशान न हो, बीमा कंपनी से पैसे मिल जाएंगे या पुलिस चोरों को पकड़ लेगी। लेकिन निधि जानती थी कि थानों की फाइलों में गुम हुए गहने कभी वापस नहीं लौटते। उसे गहनों के जाने से ज्यादा उस भरोसे के टूटने का दुख था जो उसकी माँ ने उस पर किया था।

निधि अंदर ही अंदर घुट रही थी। ऐसे में उसकी छोटी बहन ने उसे फोन पर सलाह दी कि वह इंटरनेट के लिए एक वीडियो बनाए। बहन का कहना था कि आजकल सोशल मीडिया की ताकत बहुत बड़ी है और शायद इससे कुछ मदद मिल जाए। निधि ने शुरुआत में साफ मना कर दिया। उसे लगा कि लोग क्या सोचेंगे कि नई बहू इंटरनेट पर बैठकर रो रही है। लेकिन उस रात जब पूरा घर सो गया, तो निधि की आँखों से नींद कोसों दूर थी। उसे बार बार अपनी माँ का रोता हुआ चेहरा याद आ रहा था। उसने हिम्मत जुटाई और अपने मोबाइल का कैमरा चालू कर लिया। उस वीडियो में कोई दिखावा नहीं था। वह अपने शादी के जोड़े में बैठी थी, उसके मेहंदी लगे हाथ जुड़े हुए थे और आँखों से लगातार आँसू बह रहे थे। उसने रुँधे हुए गले से कहा कि वह नहीं जानती कि वे भैया कौन हैं जो उसका थैला ले गए हैं। उसने बताया कि उस थैले में सिर्फ सोना नहीं है, बल्कि उसके मायके की यादें, नानी की निशानी और माँ की चूड़ियाँ हैं। उसने हाथ जोड़कर विनती की कि वे चाहे तो कोई और कीमती सामान रख लें, लेकिन उसकी माँ और नानी की निशानियाँ लौटा दें। यह कहते हुए वह फफक कर रो पड़ी। उसने वीडियो को इंटरनेट पर डाल दिया और कैप्शन में लिखा कि कृपया मेरे गहने लौटा दो।

पहले एक घंटे में उस वीडियो को सिर्फ सौ लोगों ने देखा। लेकिन भावनाएं जब सच्ची होती हैं, तो वे अपनी राह खुद बना लेती हैं। धीरे धीरे वह वीडियो फैलने लगा। कुछ लोगों ने इसे नाटक कहा, लेकिन बहुत सी महिलाओं ने निधि के दर्द को अपना दर्द समझा। तीसरे दिन तक उस वीडियो को आठ लाख से ज्यादा लोग देख चुके थे और वह शहर भर में चर्चा का विषय बन गया था।

उसी तीसरे दिन, शहर के दूसरे किनारे पर बनी एक कच्ची बस्ती के छोटे से कमरे में दो लड़के बैठे थे। उनके नाम विकास और सुनील थे। दोनों की उम्र मुश्किल से बीस बाइस साल रही होगी। वे दोनों राजमिस्त्री के साथ मजदूरी का काम करते थे। लेकिन कुछ समय पहले काम बंद हो जाने के कारण वे बेरोजगार हो गए थे। विकास की माँ बहुत बीमार रहती थी और उसके इलाज के लिए पैसों की सख्त जरूरत थी। सुनील का छोटा भाई स्कूल की फीस न भर पाने के कारण पढ़ाई छोड़ चुका था। मजबूरी ने उन्हें चोरी के रास्ते पर धकेल दिया था। जब उन्होंने वह थैला खोला, तो उनकी आँखें फटी रह गईं। उन्होंने अपनी पूरी जिंदगी में इतना सोना एक साथ सिर्फ सुनार की दुकान के शीशे के पीछे ही देखा था। विकास ने गहरी साँस लेते हुए कहा कि अब उसकी माँ का इलाज किसी बड़े अस्पताल में हो जाएगा।

तभी सुनील के मोबाइल पर इंटरनेट चलाते हुए अचानक निधि का वही वीडियो सामने आ गया। वीडियो में एक नई दुल्हन रो रही थी, उसके हाथ जुड़े हुए थे। सुनील की अपनी सगी बहन की शादी भी दो महीने पहले ही हुई थी। विदाई के वक्त उसकी माँ ने भी अपनी बेटी को एक छोटा सा हार देते हुए बिल्कुल यही शब्द कहे थे कि यह घर की इज्जत है। सुनील का दिल धक से रह गया। विकास ने झुंझलाते हुए कहा कि इस वीडियो को बंद कर दे क्योंकि वे चोर हैं, कोई संत महात्मा नहीं। लेकिन वीडियो बंद होने के बाद भी वह रोता हुआ चेहरा उन दोनों की आँखों के सामने बार बार आ रहा था। उस रात सुनील बिल्कुल नहीं सो सका। उसे बार बार अपनी बहन का चेहरा दिखाई दे रहा था। उसे अपनी माँ की दी हुई वह सीख याद आ रही थी कि इंसान को भूखे मर जाना चाहिए लेकिन कभी किसी दूसरे का हक नहीं मारना चाहिए।

चौथे दिन की सुबह करीब चार बजे, जब पूरी गली गहरी नींद में सोई हुई थी, वही पुरानी मोटरसाइकिल एक बार फिर निधि के घर के सामने आकर रुकी। चेहरे पर कपड़ा बाँधे हुए उन दोनों लड़कों ने वह काला थैला चुपके से घर के मुख्य दरवाजे के अंदर फेंक दिया और बिना कोई आवाज किए वहाँ से चले गए।

सुबह जब निधि की सास ने दरवाजा खोला, तो उन्होंने देखा कि दरवाजे के पास वही काला थैला पड़ा है। थैले पर थोड़ी मिट्टी लगी थी, लेकिन वह पूरी तरह से बंद था। उन्होंने तुरंत पुलिस और पूरे परिवार को बुलाया। जब पुलिस के सामने वह थैला खोला गया, तो उसमें रखा एक एक गहना अपनी जगह पर सुरक्षित था। चोरों ने गहने की एक छोटी सी डिब्बी तक नहीं खोली थी। उस थैले के अंदर एक मुड़ा हुआ कागज का टुकड़ा भी पड़ा था। जब निधि ने उसे खोला, तो उसमें टूटे फूटे अक्षरों में लिखा था कि हमें माफ कर दो दीदी, हमसे बहुत बड़ी गलती हो गई। यह पढ़ते ही निधि वहीं जमीन पर बैठ गई और उसके सब्र का बाँध टूट गया। वह फूट फूट कर रोने लगी, लेकिन यह रोना दुख का नहीं बल्कि राहत और किसी अनजान पर विश्वास के जीत जाने का था।

यह खबर जंगल की आग की तरह पूरे शहर में फैल गई। लोगों को यकीन नहीं हो रहा था कि आज के जमाने में कोई चोर इतनी बड़ी रकम वापस कर सकता है। निधि ने उसी दिन एक और वीडियो बनाया। इस बार उसके चेहरे पर आँसू नहीं बल्कि एक बहुत ही सुकून भरी मुस्कान थी। उसने हाथ जोड़कर कहा कि वह उन भाइयों को धन्यवाद देना चाहती है जिन्होंने उसके गहने नहीं बल्कि इंसानियत पर उसका भरोसा लौटाया है।

उस रात वह काला थैला तो लौटा ही, लेकिन उसके साथ यह उम्मीद भी लौट आई कि इंसान के अंदर का ईमान कभी पूरी तरह नहीं मरता। वह बस गरीबी और मजबूरी की धूल के नीचे दब जाता है और जब कोई सच्चे दिल से गुहार लगाता है, तो वह ईमान फिर से जाग उठता है।

— महेन्द्र तिवारी

महेन्द्र तिवारी

जन्म : फरवरी 1971, भोजपुर (बिहार) शिक्षा : स्नातकोत्तर (अर्थशास्त्र), डॉ. भीमराव अंबेडकर विश्वविद्यालय, आगरा सेवाएं : भूतपूर्व वायुसैनिक एवं वर्तमान में राष्ट्रीय अभिलेखागार, नई दिल्ली में कार्यरत कृतियाँ : विभिन्न समाचार पत्र-पत्रिकाओं में अब तक सैकड़ों लेख, कविताएँ और कहानियाँ प्रकाशित। संपादन : ‘दि ग्राम टुडे’ लघुकथा विशेषांक (अतिथि संपादक) प्रकाशन : कहानी संग्रह - एक लेखक का पुनर्जन्म (शीघ्र प्रकाश्य) मोबाइल : (+91) 9989703240 ई-मेल : mahendratone@gmail.com

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