जाने के बाद भी
राम बाबू के सपने में उनकी दिवंगत पत्नी आयी और कहने लगी- ” पितृपक्ष बिताने वाला है आप बेटों से मेरा श्राद्ध करने को क्यों नहीं कहते” राम बाबू उदास हो कर कहने लगे- कह तो रहा हूं पर मेरी सुनते कहां हैं वो लोग।
अगले दिन सुबह राम बाबू ने अपने बेटों के सामने अपने सपने वाली बात बताई तो, दोनों भाई एक दूसरे का चेहरा देखने लगे। राम बाबू उनके मनोभाव समझ गये कि दोनों ही भाई श्राद्ध का खर्च एक दूसरे पर डालना चाहते हैं। जीते जी तो उन्होंने अपने मां बाप को बांट रखा था।अब अपनी मां के जाने के बाद भी वही हाल है।
कुछ देर बाद राम बाबू बैंक गये। पेंशन के कुछ पैसे निकाले और वृद्धाश्रम में अपनी पत्नी के नाम पर वृद्ध जनों को भोजन करा आयें।अगली रात उन्होंने अपनी पत्नी को सपने मुस्कुराते देखा।सुबह उनके मन में असीम शांति थी।
— अमृता राजेंद्र प्रसाद
