कविता

कविता : कविता चाँद पर

हवाओं से रगड़ खा खा कर
छिल गए कन्धे
हथेलियों पर बादल टिका कभी नहीं टिका
आँखे धूल सने आसमान पर
जहाँ ना कोई नक्षत्र ना आकाशगंगा…

अमावस की रात में
अपना ही हाथ सूझे ना सूझे…
पर कविता अगर चाँद पर लिखनी है तो
चाँद पर ही लिखूंगा….

माया मृग

एम ए, एम फिल, बी एड. कुछ साल स्‍कूल, कॉलेज मेंं पढ़ाया. कुछ साल अखबारों में नौकरी की. अब प्रकाशन और मु्द्रण के काम में हूं. किताबें जो अब तक छपी हैं- शब्‍द बोलते हैं (कविता 1988), कि जीवन ठहर ना जाए (कविता 1999), जमा हुआ हरापन (कविता 2013), एक चुप्‍पे शख्‍स की डायरी (गद्य कविता 2013), कात रे मन कात (स्‍वतंत्र पंक्तियां 2013). संपर्क पता : बोधि प्रकाशन, एफ 77, करतारपुरा इंडस्‍ट्रीय एरिया, बाइस गोदाम, जयपुर