विरह गीत – हृदय को जगा दूं
धरा को सुला दूं, गगन को जगा दूं प्रिय , चांदनी में विरह गीत गाऊं मैं। बहुत है उदासी हृदय
Read Moreधरा को सुला दूं, गगन को जगा दूं प्रिय , चांदनी में विरह गीत गाऊं मैं। बहुत है उदासी हृदय
Read Moreद्वार तुम्हारे आया हूँ प्रिय, जीवन में दुत्कार बहुत है। जीवन का मधु हर्ष बनो तुम, जीवन का नव वर्ष
Read Moreमेरी हमेशा कोशिश रहती है कि मैं वृक्ष सा बनूं। क्यों कि वृक्ष की छाया में राह चलते राहगीर पनाह
Read Moreप्यार अमूल्य धरोहर है इसकी अनुभूति किसी योग साधना से कम नहीं है, इसके रूप अनेक हैं लेकिन नाम एक
Read Moreप्रेम कोई प्रर्दशन नहीं है, प्रेम झूठी उपासना नहीं है, प्रेम अतृप्त वासना नहीं है, प्रेम कोई दिखावा नहीं है।
Read Moreमेरा अपना इस जग में , आज़ अगर प्रिय होता कोई। मैंने प्यार किया जीवन में, जीवन ही अब भार
Read Moreस्नेह की मधुर बयार में पला प्रिये, वियोग दीप में लिपट, पतंग सा जला प्रिये। चूमती धरा किरण उठी
Read Moreन राग के लिए न रीति के लिए, कि दीप जल रहा अनीति के लिए। न सांझ में सिमट सकती
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