ग़ज़ल
हम आज तक खामोश हैं और वह भी कुछ कहते नहींदर्द के नग्मों में हक़ बस मेरा नजर आता है
Read Moreमिट्टी ने कभी नहीं पूछा—“मुझे क्या बनना है?”बस किसी शिल्पी के हाथों मेंख़ुद को सौंप दिया। हर चोट जो उस
Read Moreआम के आम और गुठलियों के भी दाम मिलते हैं,कभी अंगूर खट्टे हैं,कभी खरबूजे, खरबूजे को देख कर रंग बदलते
Read Moreवक़्त की साजिश समझ कर, सब्र करना सीखियेंदर्द से ग़मगीन वक़्त यूँ ही गुजर जाता है जीने का नजरिया तो,
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