नववर्ष : उत्सव नहीं,आत्मपरीक्षण
हर वर्ष बारह महीनों के बाद नववर्ष आता है। तारीख बदलती है, कैलेंडर बदलता है, मोबाइल पर शुभकामनाओं की बाढ़
Read Moreहर वर्ष बारह महीनों के बाद नववर्ष आता है। तारीख बदलती है, कैलेंडर बदलता है, मोबाइल पर शुभकामनाओं की बाढ़
Read Moreहर शाम पार्क में लोग उसे उसी बेंच पर देखते थे। दाईं ओर एक कुर्सी हमेशा खाली रहती। न कोई
Read Moreबर्फ गिरने की वह शांत रात डेनियल को हमेशा याद रहती है। खिड़की के बाहर चीड़ के पेड़ों पर जमी
Read More1.रिश्ते टूटे कहाँ हैं,हम टूटे हैंअहंकार के भार तलेप्रेम दबकर रह गया। 2.घर तो दीवारें हैं,टूटे हैं मनजिन्होंने संवाद छोड़
Read Moreहाँ, मैं भारत हूँ…सृष्टि के आरंभ से आज तकअमर गाथाओं का प्रवाह हूँ।विश्वगुरु कहलाने का गौरव लिएमैं ज्ञान का दीप,संस्कार
Read Moreवह कैसी औरतें थीं जो घर संभालती थीं…जो सुबह की पहली किरण के साथ उठ जाती थीं,परिवार की धड़कनों को
Read Moreसड़क पर धूप तप रही थी। पांवों के नीचे तपती मिट्टी, कंधों पर बोझ से भरे थैले और आँखों में
Read Moreबात कोई पुरानी नहीं थी, बस कुछ ही महीने हुए थे शहर आए। एक अच्छी नौकरी, बड़ा सपना और ऊँची
Read Moreस्थान: एक गाँव और सेना का शिविर पात्र: 1. अर्जुन – एक युवा सैनिक 2. अर्जुन की माँ – देशभक्त
Read Moreशहर के इस कोने में रोज़ ही भीड़ उमड़ती थी—ऑफिस जाने वालों की तेज़ रफ्तार, सब्ज़ी वालों की आवाज़ें, और
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