बेड़ियां सिर्फ लाड़ो के नाम
गत दिनों में सामने आयी कुछ सनसनीखेज वारदातें जैसे श्रद्धा मर्डर हत्याकांड और आयुषी यादव मर्डर केस ने पूरे भारत में सबका और खासकर हर माता पिता का दिल दहला रखा है। दोनों ही केस में जो सबसे ज्यादा हाईलाइट होने वाली बात है वो है माता पिता से उनकी संतान का रिश्ता कमजोर होना।
सारी रोक-टोक सिर्फ लडकियों को विरासत में मिली होती है। परिवार और कुल के मान सम्मान का दायित्व सिर्फ बहु और बेटियों के सिर पर होता है। बेटों का इससे कोई लेना देना नहीं होता। जब बेटे बाहर जाकर कोई गलती या गुनाह करके आएं तो बात को दबा दिया जाएगा। किसी माता पिता में इतना साहस नहीं कि उसको घर से बाहर निकाल दें या उसकी सारी स्वतंत्रता छीन लें। पुत्रमोह की काली पट्टी आंखों को अंधा बना देती है। फिर क्या कानून और क्या संस्कार ? वहीं किसी बहु का हल्का सा घूंघट खुला रह जाए जेठ के सामने तो कयामत आ जाती है।
उदाहरण के लिए अगर कोई लड़का दूसरी जाति में शादी करके बहु अपने घर में लाता है तो जाहिर सी बात है घरवाले नाखुश रहते हैं और मनमुटाव में पूरा परिवार जीवनयापन करता है कोई बेटे को घर से निकालने का साहस नहीं रखता ये नहीं कहता कि तूने तो हमारे कुल को कलंकित कर दिया। वहीं अगर ऐसा लड़की ने किया हो कि दूसरी जाति या बिरादरी में उसने शादी कि तो जिंदगी भर उसका परिवार ताने सुनता है और सुनाता है। बेटी से रिश्ता तक खत्म कर दिया जाता है क्योंकि अब तो वो दूसरे घर की हो चुकी है। उसने कुल की मर्यादा भंग जो कर दी।
कितनी भी महिलाओं के बराबरी के हक के बारे में बात की जाए, कितना ही महिला सशक्तिकरण के भाषण दिए जाएं आज भी हर घर में एक बेटी और एक बहु है जो खुद ये सोचने पर विवश है कि मैंने अगर अपने सपनों की उड़ान भरी तो मेरा घोंसला तोड़ दिया जाएगा मेरा परिवार बिखर जाएगा। आज तक सोच तो वहीं की वहीं ही है। क्या किया जाए उन अधिकारों का ? जितनी मेहनत घर के लोगों ने आवाज़ दबाने में की उतनी तो बाहर वालों की बोलती बंद करने में करते तो आज आपके घर की लक्ष्मी आपको गर्वित होने का सौभाग्य प्रदान करती।
अभी हाल ही में जो वारदात श्रद्धा के साथ हुई वो किसी के भी साथ और किसी भी धर्म के इंसान के द्वारा हो सकती थी। लेकिन धर्म की वकालत करने वाले बुद्धिजीव ये खुली आँखों से देखने में अयोग्य है। किसी भी मुद्दे में धर्म का एंगल जोड़ना आजकल उतना जरूरी हो गया है जितना कि इंसान को जीवित रहने के लिए हवा और पानी।
अगर आपका बेटा या बेटी कोई ऐसा निर्णय लेता है जो आपको सही नहीं लगता तो आप उससे बात करिए, उसको विश्वास दिलाएं कि “बेटा हम तुम्हारे साथ हैं हमेशा लेकिन अगर तुम कोई गलत राह पर मुड़े तो तुम्हारा गलत होते हुए हम कैसे देख लें? तुम्हारे निर्णय का सम्मान करते हैं लेकिन तुम भी एक बार हमारे अनुभव को सम्मान देकर हमारी जगह आकर सोचो और फिर बताओ। “
माता-पिता कभी अपने बच्चों का बुरा नहीं चाहते। वे डर जाते हैं कि कहीं कुछ गलत हो गया तो क्या होगा। और ये डर उनका अपने बच्चे से रिश्ते में दूरियां ला देता है जिसका दुनिया फायदा उठाती है। आज हर कोई श्रद्धा को कोस रहा है। हाँ! मैं भी मानती हूँ कि उससे इंसान समझने और पहचानने में गलती हुई है। लेकिन क्या सिर्फ उसकी ही गलती है ? जिस बच्चे के सिर पर से माँ बाप का हाथ उठ जाए वो बाहर वालों की मदद से कितने समय तक सही – गलत का फैसला कर पायेगा। लोग बाते करते हैं कि इतनी छूट ही मत दो लड़की को कि हाथ से चली जाए। क्योंकि बदनामी हो जाएगी। अगर आप बदनामी या कुछ गलत होने के डर से अपनी बेटी के कोई भी निर्णय लेने की स्वन्त्रता को खत्म कर रहे हो तो इसका मतलब है आप आज तक अपनी बेटी पर भरोसा नहीं कर पाए और न वह आपको भरोसा दिला पायी। उसका निर्णय अगर गलत है तो आप बात करें उससे, न कि उसको डराएं – धमकाएं और मेंटली टॉर्चर करें। क्योंकि यह आपका डर है जो खुद आप पर हावी हो रहा है इसलिए आप उसका सामना नहीं उससे बचना चाहते हैं। जब आपने संस्कार देने में कोई कमी नहीं की है फिर डर किस बात का है। जब आपने बेटी को अपने विश्वास में लिया हुआ है कि-“तुम अकेली नहीं हो, हम हमेशा तुम्हारे साथ हैं कोई बात हो तो बेझिझक बताओ।” तो फिर वो क्यों किसी बाहर वाले को अपना विश्वास जीतने देगी। आज दुनिया का सबसे कमजोर व्यक्ति वह है जिसका परिवार, जिसके माता पिता उसके साथ नहीं खड़े हैं। सारे ऐशोआराम, दौलत और इज्जत के होते हुए भी उसकी जिंदगी शून्य है। आपका अपनी संतान से रिश्ता ही कमजोर हो रहा है तो बाहर वाले अपना रिश्ता मजबूत करने की पूरी कोशिश करेंगे, इस बात में कोई शक है ही नहीं। अपनी बात रखने का हक सबके पास होता है लेकिन अगर बात रखने ही नहीं दी जाए तो ये न्यायपूर्ण नहीं होगा।
— सौम्या अग्रवाल
