ग़ज़ल
अपने महबूब की आंखों को अश्कबार नहीं करता
आशिक इश्क को रुसवा सर ए बाज़ार नहीं करता
मुहब्बत और हवस इक साथ दिल में रह नहीं सकते
जिस्म की चाह जो रखे वो कभी प्यार नहीं करता
इश्क है आग का दरिया ये इक शायर ने बोला था
अगर मैं आग से डरता तो दरिया पार नहीं करता
मुसीबत में जो घबरा के कभी तुम साथ मांगो तो
जो सच्चा दोस्त होता है कभी इंकार नहीं करता
गलतियां होती हैं मुझसे मगर मैं एक गलती को
एक ही बार करता हूं कभी दो बार नहीं करता
— भरत मल्होत्रा
