वक़्त की हर शै गुलाम
आदमी कितना बेबस हो जाता है
जब बूढ़ा बीमार हो लेट जाता है खाट पर
मुख मण्डल की सारी आकृति विकृत हो जाती है
करुणामय हो जाता है चेहरा
विचरता है लेटा लेटा अपने अतीत में
रोता है याद कर पुराने वक़्त को
लेकिन वक़्त होता है बेरहम
चलता अपनी गति
ठहरता है नहीं कहीं
कुछ क्षण आराम कर
फिर बढ़ जाता मंजिल अपनी
