गीत – जीवन मुस्काएगा
माया मद के मकड़ जाल से जब मानव बच पाएगा।
क्षणभंगुर मानव का जीवन पर पल-पल मुस्कायेगा।
अमर न कोई इस दुनिया में जो आया वह जाएगा।
पाप कर्म में फंस मत बंदे जीवन नर्क बनाएगा।
जीवन दो दिन का है मेला नहीं सत्य से मुख मोड़ो,
काया माया क्षणभंगुर सुख पल-पल यह भरमाएगा।
धन दौलत माया के सुख में जब घमंड गहराएगा।
जंज़ीरो में मानव तब तब स्वयं जकड़ता जाएगा।
जीवन चार दिनों का मेला आखिर फिर है चला चली,
उलझन सारी मिट जाएंगी तथ्य समझ जब आएगा।
अहम भाव को तजने वाला ही मानव कहलाएगा।
चार दिनों के इस जीवन में सुख ही सुख बरसाएगा।
ईर्ष्या द्वेष दम्भ कल्मश छल इनको चूर-चूर करदो,
अमर यहाँ पर कौन भला है पर जीवन खिल जाएगा।
सत्कर्मो की चाबी से भ्रम का ताला खुल जाएगा।
फैलेगा स्वर्णिम प्रकाश फिर अंधकार मिट जाएगा।
संग “मृदुल”न जाती माया क्यों इतरता है मद में ,
मर्म समझ कर करे कर्म सद सुयस वही तो पाएगा।
— मंजूषा श्रीवास्तव “मृदुल”
