मैं मिलूंगी नहीं कहीं तुम्हें
मैं मिलूंगी नहीं कहीं तुम्हें
क्योंकि मैं तुम्हारी धड़कन में समाई हूं
मैं तुम्हारे अंदर की आवाज हूं
मैं तुम्हारी सांस में हूं
मैं तुम्हारे शब्दों में हूं
मैं तुम्हारे गीतों में हूं
मैं तुम्हारे अनकहे लफ्जों में हूं
मैं तुम्हारी आवाज हूं
हर जर्रे का मैं तुम्हारा सुकून हूं
मैं ओर कोई नहीं तुम्हारी आत्मा ही हूं
— गंगा मांझी
