आशा दीप
आशाओं के दीप कभी जब मन में जलते हैं
तब खुशियों के मेघ सुहाने खूब उमड़ते हैं।
पुरवाई सी चलने लगती जेठ दुपहरी में
खूब दहकते अंगारे भी शीतल लगते हैं ।
क्योंकि मन में स्वप्न बड़े हिमगिरि से पलते हैं
उन आशाओं से ही मन में गीत उपजते हैं।
जब चलती हैं सांस, सांस आशाओं के भ्रम में
तब अंधियारे भी तो मन को अच्छे लगते हैं
कहाँ सुहाती धूप सुनहरी ,कब अच्छी लगती
आशाओं के भ्रम कितने मनमोहक लगते हैं ।
आशाओं के स्वप्न दिवस में भी दिख जाते हैं
अंध तमस में सपने आ आ कर भरमाते हैं ।
पर जब सच से आँख मूँद कर बैठेगा कोई
तब अंधियारे इसीलिए तो अच्छे लगते हैं ।
आशाओं की तृष्णा हम को क्यों भरमाती है
सच को छोड़ झूठ की दुनिया हम को भाती है
स्वप्न के मीठे पुड़ादेश से पेट नहीं भरता
फिर ऐसे कड़वे फल भी क्यों मीठे लगते हैं।
सच को जब भी जानोगे तो सच दीखेगा ही
तब सूरज की किरणों से कोई राह मिलेगी ही
दिन का उजियारा ही हम को राह दिखाएगा
दिन के देखे स्वप्न हमे तब अच्छे लगते हैं।
— डॉ. वेद व्यथित
