पुस्तक समीक्षा

बेस्ट सेलर ऑफ़ द ईयर पुरस्कार 2025 विजेता उपन्यास ‘सरनेम’

मैंने अपने आज तक के जीवन में स्त्रियों पर अनेकों रचनाएँ,ढेरों लेख और न जाने कितनी ही कहानियाँ पढ़ी हैं, किंतु दिल्ली विश्वविद्यालय के प्रतिष्ठित डॉ ज़ाकिर हुसैन महाविद्यालय में सहायक प्रवक्ता के पद पर कार्यरत और मेरे लिए अति सम्माननीय और बेहद प्रिय डॉ. राजकुमारी राजसी जी का बहुचर्चित और बेस्ट सेलर उपन्यास ‘सरनेम’ उन सबमें अपनी एक अदद पहचान और अलग स्थान रखता है। दिखावे,लंबी चली आ रही परंपराओं और सो कॉल्ड रीति रिवाज़ों की दुहाई देकर एक स्त्री को न केवल विवाह के पूर्व अपितु विवाह के पश्चात भी क्रमश: पिता और पति का सरनेम ऐसे दे दिया जाता है मानों जन्म से ही स्त्री का अपना तो कुछ है ही नहीं।नाम देने तक की बात तो समझ आती है,किन्तु नाम के साथ सरनेम भी… आख़िर क्यों? आख़िर क्यों एक स्त्री को अपने नाम के साथ किसी के भी सरनेम को लगाने की आवश्यकता है.?क्या स्त्री बिना किसी सरनेम के अपूर्ण है,अधूरी है या फिर अस्तित्वहीन है??क्या कभी एक भी स्त्री को समाज के ठेकेदारों ने एक सामान्य और ख़ुद में पूर्ण शख़्स समझ कर इतनी आज़ादी दी है कि उसे फ़क़त उसके नाम से पहचान मिले,अपने अस्तित्व को साबित करने के लिए उसे अपने नाम के साथ साथ किसी सरनेम को प्रस्तुत करने की आवश्यकता न पड़े।

यह बिल्कुल ज़रूरी नहीं होता कि हम जिनको पढ़ रहे हों,उनसे कभी मिलें ही हों या उनको व्यक्तिगत रूप में जानते ही हों।जिनका लेखन ,जिनके भाव,जिनके सशक्त विचार जब समाज़ में आमूलचूल बदलाव लाने की क्षमता और सामर्थ्य रखते हों,तो स्वत: ऐसा प्रतीत होने लगता है कि न जाने हम इस व्यक्तित्व को कितने अरसे से जानते हैं।खून का रिश्ता न सही,सोच और ख़्यालों की एकरूपता और सादृश्यता के हिसाब से मैं ख़ुद को डॉ राजकुमारी जी के बहुत क़रीब पाती हूँ।ये मेरा सौभाग्य ही है कि इक क्रांतिकारी सोच रखने वाली,बेबाक और महनीय शख्सियत जिनके लेखन ने आज विश्व भर में धूम मचा रखी है,मुझे भी जानती हैं।थैंक्यू डियर राजकुमारी मैम।

राजसी मैम के बहुचर्चित उपन्यास #सरनेम से ही ली गई शानदार और बहुत कुछ सोचने पर मज़बूर कर देने वाली ये अति उत्कृष्ट पंक्तियाँ मेरे दिल को भीतर तक छू गईं..

“उस दिन जब आपसे बात हुई तो आपके विचारों ने मुझे बहुत प्रभावित किया। मैं भी सरनेम को अब शाप से कम नहीं मानती,जिसने मेरे अस्तित्व पर ग्रहण लगा दिया।मेरे स्त्रीत्व को छीन लिया, पुत्री होने की पहचान को मिटा दिया । सोच रही हूँ जब मेरा कोई अस्तित्व ही नहीं होगा तो क्या करूँगी मैं इस जीवन का ? इस सरनेम का?” उसने अपनी निगाहें हिमाक्ष की आँखों में गड़ा दी।

#सरनेम को पढ़ने के बाद यकीनन सरनेम के बारे में मेरा नज़रिया भी बदला है, और इसे स्वीकारने और साझा करने में मुझे तनिक भी हिचकिचाहट नहीं है।बहुत लंबे समय तक मैं भी सरनेम के बारे में इतना गहराई से नहीं सोचती थी।कभी ज़हन में आया नहीं या यूं कहूं कि आया भी तो वो ख़्याल दिल के दरवाज़ों के भीतर कहीं बहुत दूर दफ़्न रहा होगा कि क्या एक स्त्री की वास्तविक पहचान उसके सरनेम से ही होती है। समाज उसे उसके सरनेम से ही जान सकता है? उसकी अपनी खुद की कोई पहचान नहीं.? शायद इसीलिए मैंने भी कभी बड़े ही गर्व से अपने नाम के साथ सरनेम लगाया और आज भी लगा रही हूँ।कभी दिमाग में यह नहीं आया कि क्यों नहीं मेरे पति ने मेरे विवाह पूर्व वाले सरनेम को अपने नाम के साथ लगाया.. क्यों ससुरालवालों ने विवाह होते ही मेरे सारे दस्तावेजों में से मेरा सरनेम हटवाकर अपना दिया (या थोपा)सरनेम लगवाने में महीनों की मशक्कत की। आख़िर क्यों की उन्होंने इतनी जल्दी? क्या ज़रूरत थी सरनेम बदलवाने की? क्या पुराने चल रहे सरनेम के साथ उन्हें मेरा नाम और मेरा व्यक्तित्व नहीं भा रहा था?
इस सब के होने में किसी और की गलती शायद बहुत कम और मेरी गलती सबसे ज़्यादा रही।क्यों मैंने तभी विरोध दर्ज़ नहीं किया, क्यों मैं उनसे उस वक्त सवाल नहीं पूछ सकी कि क्या बिना सरनेम बदले हम अच्छे जीवन साथी बनकर ज़िन्दग़ी का सफ़र एक साथ तय नहीं कर पाएंगे..क्यों उस वक्त मेरे मन में यह जानने की जिज्ञासा उत्पन्न नहीं हुई कि क्या सरनेम ही मेरे अस्तित्व की,मेरे स्त्री होने की,मेरे इंसान होने की असली पहचान है।

सरनेम को पढ़ते वक्त बहुत सी जगहों पर मैंने ख़ुद को भी इस उपन्यास का एक क़िरदार बनते हुए महसूस किया।अपने आसपास की बहुत सी स्त्रियों के अनुभव भी एकाएक मस्तिष्क में उभर आए कि शादी हो जाने के बाद वे अब अपने नाम के साथ अपने पिता और पति दोनों का ही सरनेम लगाती हैं और गर्व भी महसूस करती हैं ।सच कहूं तो मुझे इसमें दोहरी बेड़ियां नज़र आती हैं और उन स्त्रियों की सोच और सरल स्वभाव पर दया।

युवाओं के बीच चर्चित इस उपन्यास में जब अवंतिका ने ये कहा कि..”मेरा नाम जो मेरे पिता ने मुझे दिया था वही मेरा असली नाम था और वही सरनेम।लेकिन मैं अब अपने पिता का दिया सरनेम भी इस्तेमाल नहीं करना चाहती। मुझे केवल अपने अस्तित्व के साथ जीना है किसी के दिये सरनेम के साथ नहीं।” तो जैसे उस वक्त उसके चेहरे पर मुस्कान आई थी,बिल्कुल वैसे ही ये पढ़कर मेरे लब भी मुस्कुराए थे।अहसास हुआ था कि चलो देर से ही सही,मेरे फैवरेट किरदार ने हिम्मत जुटाकर एक सही निर्णय लेकर आत्मसंतुष्टि का स्वाद चखने का सुख तो प्राप्त किया।

लिखना तो बहुत कुछ चाहती हूं किंतु मुझे लगता है कि #सरनेम एक ऐसी कृति बन चुका है ,इतनी लोकप्रियता हासिल कर चुका है कि मैं कितना भी लिखूं कम ही रहेगा।अंत में इतना ही कहना चाहूंगी कि #सरनेम लीक से हटकर लिखा हुआ उपन्यास है जिसे बहुत ही सरल किन्तु प्रभावी शैली में लिखा गया है।इसका प्रमाण इसी बात से मिल जाता है कि आज #सरनेम का गुजराती, इंग्लिश और अन्य कई भाषाओं में अनुवाद हो चुका है।मैं तो इसे #सरनेम की लेखिका डॉ राजकुमारी राजसी जी की अविस्मरणीय अमिट और अतुलनीय उपलब्धि ही कहूंगी कि इतने कम समय में इस उपन्यास ने इतना यश कमाया और बेस्ट सेलर उपन्यास का खिताब अपने नाम किया।

मेरी उस सर्वव्यापी और सर्वज्ञ शक्ति से इतनी ही कामना है कि #सरनेम यूं ही दिनोदिन नित नए कीर्तिमान स्थापित करता रहे और डॉ राजकुमारी राजसी जी की लेखनी में धार बनी रहे।ज्ञान और विद्या का वरदान देने वाली माँ सरस्वती अपनी इस कुशाग्रबुद्धि, सरल, सहज,भावनिपुण,विवेकी,स्नेही,प्रखर,बुद्धिजीवी और गुणवती पुत्री पर अपना आशीर्वाद सदैव बनाए रखें।

— पिंकी सिंघल ‘अर्श’

पिंकी सिंघल

अध्यापिका शालीमार बाग दिल्ली