गीतिका/ग़ज़ल ग़ज़ल *हमीद कानपुरी 09/01/202609/01/2026 0 Comments अब की भटकनकल की उलझन दर- दर भटकेकर के अनबन सब से अच्छास्थिर सा है मन सेहत चाहेतोड़े सहजन जी भर मस्तीसुन्दर जीवन — हमीद कानपुरी