कविता

कविता – रंगों का लोकतंत्र

फागुन की मृदु बयार बही,
धरती ने नव श्रृंगार किया।
रंगों की कोमल छाया ने,
जीवन का अभिनव सार दिया।

अबीर-गुलाल उड़े गगन में,
मुस्कानों का विस्तार हुआ,
मन के सूने आँगन भीतर,
प्रेम सुधा का संचार हुआ।

भूल गए सब भेदभाव को,
मिटा द्वेष का अंधकार,
अमीर-गरीब संग हँसते,
एक हुआ मानव परिवार।

जाति-पांत की रेखा टूटी,
स्नेह बना पहचान नई,
जात-परजात सभी समाहित,
मानवता की शान नई।

ढोल-मृदंग की लय पर थिरके,
जीवन का उल्लास अपार,
रंगों में भीग गया जैसे
भारत का उज्ज्वल संस्कार।

सामाजिक समता का संदेश,
हर आँगन में आज उतरा,
राष्ट्रीय एकत्व का दीपक
जन-जन के अंतर में जला।

होली केवल पर्व नहीं है,
प्रेम-पथ का मंगल द्वार,
मन से मन का सेतु बनाती,
रंगों का यह लोकतंत्र अपार।

— उमाकांत भारती

उमाकांत भारती

जन्म : 10 सितम्बर 1948 ई. कृतियाँ- ममता की मूर्ति, प्रतिशोध, कैसे कहूँ, बदलते रिश्ते, काला दिन, बुढ़ापे का गणित, नया बेटा विभिन्न पत्र-पत्रिकाओं में 100 से अधिक कहानियाँ प्रकाशित। लघुकथायें एवं कवितायें भी प्रकाशित। आकाशवाणी से कहानी, लघुकथा, आलेख प्रसारित। सम्पादन- पलाश अर्द्धवार्षिक का 2014 से सम्पादन सम्पर्क- मेहता निवास, नया टोला, भीखनपुर, गुमटी नं. 12 के पास, भागलपुर-812001 बिहार सचल दूरभाष- 9608228922 E-mail umakantsingh34535@gmail.com

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