पुस्तक समीक्षा

यथार्थ की सुई एवं कल्पना के धागे से बुनी कहानियाँ

अपनी पहली पुस्तक प्रत्येक लेखक को प्रिय होती है, चाहे वह जिस भी विधा की हो। हाँ उसके प्रकाशित होने के चार छह साल व्यतीत हो जाने के पश्चात भले ही लेखक जब साहित्य को पढ़-पढ़कर अपने को तराश लेता है, तो उसे अपनी उसी प्रिय पुस्तक में कमियाँ दिखने लगती हैं। अपने लेखन की कमियों को समझ लेना बुद्धिमता की पहचान है। और लेखक स्वयं के लिखे को संशोधित कर लें, परिपक्व हो आई लेखनी से अपने लेखन को पुनः सँवारे, तो उसका स्वागत होना चाहिए।

पहली पुस्तक कभी-कभी छपने की लालसा के वशीभूत होकर छपवा ली जाती है। अच्छी-बुरी जो कुछ भी हो, अपनी पहली पुस्तक लेखक प्रिय तो होती ही है। आखिर वह उसी पुस्तक के माध्यम से लेखकों-कवियों की जमात में आ खड़ा होता है। और कई बार अपनी पहली पुस्तक के कारण ही जाना-पहचाना जाने लगता है। इसमें विनय कुमार कुमार निसन्देह सफल हुए हैं।

हम इनको एक लघुकथाकार के रूप में ही जानते थे। परन्तु 2024 में जब कहानी संग्रह पर दृष्टि पड़ी तो लगा कि कहानियाँ पढ़ी जाय। इच्छा प्रगट होने के चंद महीने पश्चात ही पुस्तक मेरे हाथ में थी। उसी समय दो-तीन कहानियाँ पढ़ी और अपनी राय भी लिख डाले थे, उसके बाद भी कई कहानियाँ पढ़कर टिप्पणियाँ लिख लिए थे परन्तु जब अन्तिम चार कहानियाँ पढ़कर टिपड़ियाँ ढूढ़ने लगे, तो मिली नहीं। अतः सरसरी दृष्टि से ही सही, सभी कहानियों से होकर पुनः गुजरना पड़ा। कहानीकार ने ज्वलंत मुद्दों एवं ग्रामीण जीवन में घटित घटनाओं को अपना विषय बनाया है। सामाजिक-राजनीतिक-मनोवैज्ञानिक मुद्दे तो केंद्र में हैं ही।

इस संग्रह की कहानियों में ‘सुर्ख लाल रंग’ संग्रह की प्रथम कहानी है, जो मजहबी पीले-लाल रंग से भरी है। सौदा कहानी में विवाह खर्च के लिए जमीन बेचता मजबूर पिता है तो दूसरी तरफ कपटी रग्घू महतो। एक की हानि से दूसरे को लाभ होना तो निश्चित ही है, यही इस कहानी में परिलक्षित होता है। चन्नर सामंतवाद का दर्शन कराती है तो मुर्दा परम्पराएँ’ परम्पराओं को ढोते रहने की मजबूरी प्रदर्शित करती दिखाई पड़ती है।

‘कोई और चारा भी तो नहीं’ कहानी में सरकार के बूचड़खाने बन्द करने से गाँवों में आई बिकट समस्या का वर्णन है तो ‘यह बस होना था’ में आए दिन एक्सीडेंट से होने वाले मृत्यु पर केंद्रित है। अंत में अंगदान करने का सन्देश बिन लाउड हुए हुआ है। पढ़ने वाले बच्चों की जिन्दगी का खाका ‘जुनैद’ कहानी के माध्यम से खींचा गया है तो ‘जीत का जश्न ’ कहानी में प्रधानी के चुनाव का रंग है।

हमें संग्रह की सभी कहानियाँ ठीक लगीं परन्तु खास कहानी की बात की जाय तो ‘मुर्दा परम्पराएँ’ ‘चन्नर एवं ‘असली परिवर्तन’ अधिक पसन्द आई। इंसान अपनी इच्छा शक्ति से बदलाव ले आए सकता है। जब मांझी अकेले दम पर पहाड़ खोदकर रास्ता बना सकते थे तो सुविधा प्राप्त व्यक्ति क्यों नहीं कुछ अच्छा कर सकता!

ज्यादातर कहानियाँ वाराणसी परिक्षेत्र से उठाई गई हैं अतः पात्रों की भाषा में क्षेत्रीयता विधमान है। एक दो कहानियों में ऐसा लगा कि ब्राह्मणवाद सप्रयास आया है। सरल सुंदर भाषा- शैली में लिखी कहानियों में प्रवाह है। कहीं कहीं वर्तनी की असुद्धियाँ खलती हैं। उम्मीद है भविष्य में उनकी कलम से ऐसी कहानियाँ और निकलेंगी जो पाठक के आगे दृश्यमान हो उठेगी। कुल मिलाकर लघुकथाकार विनय कुमार का स्वागत है कहानी क्षेत्र में…।

संग्रह की कुल चौदह कहानियों को लेखक ने बड़े धैर्य व तन्मयता से लिखा होगा। पाठक को अपने हृदय के समीप औरा बना लेने वाली कहानी पसन्द आती है। परन्तु लेखक तो प्रत्येक पाठक के लिए संग्रह के रूप में विभिन्न मंतव्य की कहानियाँ प्रस्तुत लड़ेगा ही और पाठकों की प्रतिक्रिया पाने की इच्छा लिए पलक पावड़े बिछाएँ प्रतीक्षारत रहेगा !

इस संग्रह के पुष्प गुच्छ हेतु, जिनमें पूरी चौदह कहानियाँ समाहित हैं, लेखक ने पाठक को भेंट किया है। हम इसके लिए विनय कुमार को हार्दिक बधाई प्रेषित करते हैं। लिखें… निःसंकोच लिखते रहें… सम्यक दृष्टि से लिखी कहानियों का सदैव स्वागत होता रहेगा… हम आपके उज्ज्वल भविष्य कक कामना करते हैं.

एक सचेत पाठक
— सविता मिश्रा ‘अक्षजा’

लेखक: विनय कुमार
पुस्तक का नाम : सुर्ख़ लाल रंग
विधा: कहानी सँग्रह
प्रकाशक: अगोरा प्रकाशन
मूल्य : 499/- रु (हार्ड बाउंड्) 160 /- (पेपर बैक)
प्रथम संस्करण: वर्ष 2022
पृष्ठ संख्या : 120
समीक्षक – सविता मिश्रा ‘अक्षजा’
9411418621

*सविता मिश्रा

श्रीमती हीरा देवी और पिता श्री शेषमणि तिवारी की चार बेटो में अकेली बिटिया हैं हम | पिता की पुलिस की नौकरी के कारन बंजारों की तरह भटकना पड़ा | अंत में इलाहाबाद में स्थायी निवास बना | अब वर्तमान में आगरा में अपना पड़ाव हैं क्योकि पति देवेन्द्र नाथ मिश्र भी उसी विभाग से सम्बध्द हैं | हम साधारण गृहणी हैं जो मन में भाव घुमड़ते है उन्हें कलम बद्द्ध कर लेते है| क्योकि वह विचार जब तक बोले, लिखे ना दिमाग में उथलपुथल मचाते रहते हैं | बस कह लीजिये लिखना हमारा शौक है| जहाँ तक याद है कक्षा ६-७ से लिखना आरम्भ हुआ ...पर शादी के बाद पति के कहने पर सारे ढूढ कर एक डायरी में लिखे | बीच में दस साल लगभग लिखना छोड़ भी दिए थे क्योकि बच्चे और पति में ही समय खो सा गया था | पहली कविता पति जहाँ नौकरी करते थे वहीं की पत्रिका में छपी| छपने पर लगा सच में कलम चलती है तो थोड़ा और लिखने के प्रति सचेत हो गये थे| दूबारा लेखनी पकड़ने में सबसे बड़ा योगदान फेसबुक का हैं| फिर यहाँ कई पत्रिका -बेब पत्रिका अंजुम, करुणावती, युवा सुघोष, इण्डिया हेल्पलाइन, मनमीत, रचनाकार और अवधि समाचार में छपा....|