कविता – अपाहिज
फूल खिला खिलकर झर गया
इसका मतलब यह नहीं कि
पौधा मर गया।
पौधे !
तू फूल गिरने पर
अफसोस मत कर
कौन किसके साथ है कयामत तक गया।
सबको मिला है सबको मिलेगा
इस जहां में मुकद्दर का लिखा
कहीं फुल टूटा तो कहीं कांटा निखर गया।
रागिनी मुकद्दर की
बजती रहेगी कयामत तक
गया तो नसीब ही सिर्फ कयामत तक गया ।
पहलू में आए
सुख-दुख समेट लो अपने दामन में
कोई यह न जान सका है
कब किसका दामन बिखर गया ।
अपाहिज है जमाना दर्द
अपाहिज है जमाने वाले
है कौन अपनी टांगों से अपनी कब्र तक गया।।
— अशोक दर्द
