पुस्तक समीक्षा

लिफाफे में कविता : कवि सम्मेलनों की सड़ांध गाथा

प्रबंधन कौशल और धन बल से अनेक लोग साहित्य के आकाश में ध्रुवतारे की तरह चमकने लगते हैं जबकि उनका साहित्य रद्दी होता है I हिंदी कविता का आसमान कुटिल कवियों और पक्षपाती आलोचकों से आच्छादित है I जिन साहित्यकारों से सहृदय होने की अपेक्षा की जाती है वे अपनी कुटिल चाल से राजनीतिज्ञों को भी मात देते हैं I हिंदी में एक से बढ़कर एक धनशोधक, यौन शोषक और पाखंडी कवि व साहित्यकार विराजमान हैं जो ‘नाम बड़े और दर्शन छोटे’ की उक्ति को चरितार्थ करते हैं I हिंदी में अनेक मठ हैं, अनेक खेमा है, विविधवर्णी तंबू है और एक-दूसरे की पीठ खुजाने की समृद्ध परंपरा है I यदि कोई कवि किसी मठ का सदस्य नहीं है तो उसकी उत्कृष्ट कविता को भी कचरा काव्य घोषित कर दिया जाता है I काव्य जगत में एक-दूसरे को आमंत्रित करने की स्थापित परंपरा है गोया कवि सम्मेलन नहीं, बनिए की दुकान हो I कवि सम्मेलनों में सब कुछ प्रायोजित होता है I हिंदी साहित्य की पतन गाथा पर अनेक कवियों और कथाकारों ने अपनी लेखनी चलायी है I वरिष्ठ व्यंग्यकार अरविंद तिवारी के व्यंग्य उपन्यास ‘लिफाफे में कविता’ में हिंदी काव्य जगत की सड़ांध, पतन और धनलिप्सा पर कशाघात किया गया है I यह उपन्यास हिंदी साहित्य के कपटपूर्ण चाल-चरित्र की भावभूमि पर आधारित है I इस उपन्यास में हिंदी साहित्य में चल रहे घात-प्रतिघात, एक-दूसरे के विरुद्ध किए जा रहे षड्यंत्र और बदमाशियों को बेपर्दा किया गया है I यह उपन्यास लंपट कवियों द्वारा कवि सम्मेलनों को मंडी में तब्दील कर देने की महागाथा है जहाँ कविगण किसी व्यापारी की भांति मोल-भाव करते हैं I अब कविता स्वांतःसुखाय नहीं, बल्कि धन के लिए लिखी जाती है I वणिक बुद्धि के इन चतुर व्यापारियों ने कविता को एक वस्तु बना दिया है I इस उपन्यास में साहित्य के बाजारीकरण और साहित्यकारों के व्यापारीकरण का बहुत जीवंत चित्रण किया गया है I साहित्य में लंपट लोगों की भरमार है जो कमसिन लड़कियों पर डोरे डालते रहते हैं I साहित्य की मंडी में ऐसे निर्लज्ज चरित्र ढेरों मिल जाएँगे I दूसरी ओर ऐसी लड़कियों की भी कमी नहीं है जो जीवन में आगे बढ़ने के लिए अपनी देह को सीढ़ी बना लेती हैं I इस उपन्यास में हिंदी के प्रदूषित, कलुषित और बाजारवादी साहित्यिक वातावरण का जीवंत चित्रण प्रस्तुत किया गया है I हिंदी के साहित्यकारों, लेखकों, कवियों और आलोचकों के अलग-अलग गिरोह हैं जो लिफाफे अर्थात धन के लिए एक-दूसरे के खिलाफ षड्यंत्र करते रहते हैं I इन कवियों के जीवन का परम और चरम लक्ष्य लिफाफा अर्थात धन है I

   हिंदी का साहित्यिक वातावरण कितना प्रदूषित, कलुषित और बाजारवादी हो गया है इसका बहुत ही रोचक चित्रण इस उपन्यास में किया गया है I उपन्यासकार ने ‘मेरी अपनी बात’ में लिखा है-‘’लिफ़ाफ़े में कविता’ आज के कवि सम्मेलनों का एक्स-रे है I इस एक्स-रे का डायग्नोसिस बताता है कि कवि सम्मेलन लाइलाज बीमारी से पीड़ित हो चुके हैं I साहित्य की चिड़िया अब इस पेड़ पर घोंसला बनाने से डरती है I यह पेड़ चाहता भी नहीं कि साहित्य की चिड़िया वहाँ बसेरा करे I” यह उपन्यास कवि सम्मेलनों की उन तंग गलियों से गुजरता है जहाँ सड़ांध, बदबू और हर प्रकार की बेहयाई है, जहाँ साहित्य का व्यापार होता है, जहाँ एक साहित्यकार दूसरे की पीठ में छूरा घोंपता है और जहाँ रिश्ते नीलाम होते हैं I यहाँ मित्रता का कोई मोल नहीं, साहित्यकारों में न्यूनतम नैतिकता नहीं और रिश्तों का कोई सम्मान नहीं I उपन्यास की कथावस्तु यथार्थ जीवन से प्रेरित है जिसे कल्पना के रंग-रोगन से रोचक बनाकर प्रस्तुत किया गया है I उपन्यासकार ने हिंदी साहित्य की गंदगी को चित्रित करने के लिए कथा का रोचक तानाबाना बुना है I इस उपन्यास में हिंदी साहित्य की  नंगी सच्चाई को शब्दों की कमीज पहना दी गई है I उपन्यास में अद्भुत पठनीयता है एवं यह पाठकों को अंत तक बांधे रखने में सफल है I

  परसादी लाल उर्फ़ ज्वलंत जगतपुरिया इस उपन्यास का प्रमुख पात्र है जिसके इर्दगिर्द उपन्यास का कथानक घूमता है I परसादी लाल बाद में ज्वलंत जगतपुरिया उपनाम से मशहूर होता है I उसके जीवन का परम लक्ष्य मंच का कवि बनकर धनार्जन करना है I साहित्य सृजन उसका उद्देश्य नहीं है, वह कविता के द्वारा धन-वैभव प्राप्त करने का अभिलाषी है I वह कहता है-‘’आज मंच का कवि लाखों रुपए कमा रहा है I उसका जीवन किसी रईस से कम नहीं है I मैं मंच का कवि हूँ, चार गीत लिखकर जीवन में करोड़ों रुपए कमाऊंगा I’’ हिंदी में ऐसे मेधाहीन कवियों की भरमार है जिन्होंने अपने जीवन में कुल पाँच कविताएँ लिखीं और वर्षों से उन्हीं कविताओं की कमाई खा रहे है I सुकवि आज भी फटेहाल हैं, लेकिन जोगाड़ कला में निष्णात कुकवियों की पाँचों उंगलियाँ घी में हैं I उपन्यास में साहित्य जगत की तमाम विसंगतियों का पर्दाफाश किया गया है I हिंदी में कवि होना सबसे सरल काम है I कवियों के आधिक्य से हिंदी जगत बजबजा रहा है I हर नुक्कड़ और हर चौराहे पर दो-चार कवि मिल जाते हैं जो कविता के नाम पर तुकबंदी करते हैं और खुद को महाकवि घोषित कर देते हैं I उपन्यासकार ने कवियों के आधिक्य पर तंज करते हुए लिखा है-‘’सूअर और बंदरों का इलाज था, मगर ये कवि लाइलाज बीमारी की तरह पूरे कसबे में फैलते जा रहे थे I”

   ‘लिफाफे में कविता’ के लोमड़ कवि, गीतकार मनुहार, भयानक कवि, अंगद कवि, मचकान, मरेजी आदि का उद्देश्य अधिक से अधिक कवि सम्मेलनों में भाग लेना और लिफ़ाफ़े प्राप्त करना है I इनके शब्दकोश में ईमानदारी, नैतिकता, साहित्य जैसे शब्द नहीं हैं I मदिरा, मुद्रा और नारी सुख इनके जीवन का परम उद्देश्य है I भयानक कवि वीर रस नहीं, बल्कि वीर्य रस के कवि हैं I अंगद कवि के लिए परसादी लाल सिर्फ दारू की बोतल है I उपन्यासकार ने कवि सम्मेलन पर निर्मम प्रहार किया है-‘’आज यह साबित हो गया कि कवि सम्मेलन में कविता से बड़ी दारू है I कवि सम्मेलन में कवि आदमी नहीं रहता, वह दारू में तब्दील हो जाता है I कवि सम्मेलन में न तो कविता महत्वपूर्ण होती है और न कवि I महत्वपूर्ण होता है कवि का मंच पर जमना I’’ इन कवियों के लिए लिफाफा अर्थात धन सब कुछ है I लिफाफा धन का प्रतीक है जिसके लिए कवि लार टपकाते तथा एक-दूसरे के खिलाफ षड्यंत्र करते रहते हैं I परसादी लाल कहता है-‘’मंचीय कवियों की सीमा ‘अर्थ’ तक सीमित है I दोहा बड़ा न चौपाई, सबसे बड़ी कमाई I” अब कवि ठेकेदार हो गए हैं I कवि सम्मेलन कराने के लिए कवियों को ठेके दिए जाते हैं I ठेकेदार कवि कुछ मरियल किस्म के कवियों को बुला लेते हैं, उन्हें थोड़े-थोड़े पैसे दे देते हैं और बड़ा हिस्सा खुद हड़प जाते हैं I

   कवि सम्मेलन आयोजित करना-कराना शुद्ध व्यापार हो गया है I कविगण अपने ही साथी कवियों के विरुद्ध एक से बढ़कर एक चाल चलते हैं और कवि सम्मेलनों को विफल करने के लिए बिसात बिछाते हैं I संस्कृत के आचार्यों ने साहित्य सृजन के लिए सहृदय होने की जो शर्त बतायी है वह परिभाषा यहाँ दम तोड़ देती है I इन मंचीय कवियों के पास हृदय ही नहीं है I उपन्यासकार ने अपने शब्दों में बारूद भरकर मंचीय कवियों पर प्रहार किया है-‘’मंचीय कवियों के लिए सबसे बड़ा पैसा होता है I वह पैसे के अलावा किसी के आगे नहीं झुकता I पैसे के आगे वह अपना परिवार, मित्र, गाँव-जवार, सिद्धांत आदि को छोड़ देता है I” सिद्धांतहीनता इन कवियों का सबसे बड़ा सिद्धांत है और लिफाफे प्रेरणा के स्रोत I इनकी लेखनी धन के द्वारा संचालित होती है I वे अहर्निश लिफाफा वंदन करते रहते हैं I कविता लेखन एक पवित्र कर्म माना जाता है, लेकिन दुर्भाग्यवश धनलोलुप कवियों ने सम्पूर्ण काव्य-कलाप को कमीशनखोरी का धंधा बना दिया है I इस उपन्यास में कविता और कवि सम्मेलनों के बाजारीकरण पर जोरदार प्रहार किया गया है I लोमड कवि ने आज के कवि सम्मेलनों का पोस्टमार्टम करते हुए कहा-‘’हर बड़े कवि ने हर बड़े शहर में अपने एजेंट छोड़ रखे हैं I वे एजेंट कवि को कवि सम्मेलन दिलवाकर अपना कमीशन वसूलते हैं I” शराब पीकर कविगण काव्य पाठ करते हैं और लिफाफे लेकर मंच से नीचे उतारते हैं I इनके सामने साहित्य चर्चा करना ‘बेगानी शादी में अब्दुल्ला दीवाना’ होना है I ‘तू मुझे बुला, मैं तुझे बुलाऊँ’ के सूत्र वाक्य के आधार पर कवि सम्मेलनों का आयोजन किया जाता है I कवियों ने कवि सम्मेलन को धन अर्जित करने का धंधा बना लिया है I एक दूसरे को उपकृत कर कवि सम्मेलनों का चोखा व्यापार पल्लवित-पुष्पित हो रहा है I कवियों के लिए साहित्य साधना बेकार की वस्तु है, मोटा लिफाफा ही चरम सुख (अंतिम लक्ष्य) है I उपन्यासकार ने लिखा है-‘’सन उन्नीस सौ नब्बे के बाद भारतवर्ष में हर वर्ष मंचीय कवियों की एक नई खेप आने लगी थी I मंचों पर मिलनेवाले मोटे लिफाफों ने मंचीय कविता का क्रेज बढ़ा दिया I’’

   लिफाफे, मदिरा और नारी सुख-कवि सम्मेलनों की सफलता के तीन मानदंड हैं I यदि इन तीनों की अच्छी व्यवस्था हो गई तो कवि सम्मेलन के सफल होने की सौ फीसदी गारंटी है I कवियों के दो-तीन कवयित्रियों से नाजायज सम्बन्ध होना आम बात है I कवयित्रियां भी कवियों को सीढ़ी बनाकर ऊपर पहुँच जाती हैं तथा ऊपर पहुंचकर कवि रूपी सीढ़ियों को लात मारकर नीचे गिरा देती हैं I लोमड़ कवि के भी दो-तीन कवयित्रियों के साथ नाजायज सम्बन्ध थे I ‘लिफाफे में कविता’ मंचीय कवियों की चरित्रहीनता और नैतिक पतन का आख्यान है I कवि को सर्जक कहा जाता है, लेकिन मंचीय कवि तो आदमी भी नहीं हैं I मंचीय कवियों में इंसानियत का लेशमात्र नहीं है I कवियों पर उपन्यासकार ने निर्मम प्रहार किया है-‘’साहित्यिक कवि पुनः आदमी बन सकता है, मगर मंचीय कवि के लिए आदमी बनने की संभावनाएं समाप्त हो जाती हैं I” उपन्यास में छद्म धर्मनिरपेक्षता, मुस्लिम तुष्टीकरण, साहित्यिक चोरी, दक्षिणपंथ और वामपंथ की राजनीति पर चोट की गई है I हमारे समाज में लोगों को भ्रांति है कि हिंदी का हर प्राध्यापक साहित्यकार होता है I हिंदी के अधिकांश प्राध्यापक भी स्वयं को साहित्यकार समझ लेते हैं भले ही वे घोर असाहित्यिक क्यों न हों I हिंदी के प्राध्यापकों के इस मानसिक रोग पर भी उपन्यासकार ने व्यंग्य की कैंची चलायी है-‘’जे.एन.यू. हो या बी.एच.यू. हिंदी विभाग के प्राध्यापक लेखक ही मिलेंगे I” उपन्यास में विश्वविद्यालयों की काली करतूतों को भी बेनकाब किया गया है I उपन्यासकार ने लिखा है-‘’विश्वविद्यालय में टॉप आनेवाले को भी इस मामले में नेताओं का सहारा लेना पड़ता है I कहीं पहले दस स्थानों से नीचे न लुढ़क जाएं इसलिए !”

   स्‍वतंत्रता प्राप्ति के अठहत्तर वर्षों के बाद भी हिंदी अपने संविधान प्रदत्‍त अधिकारों से वंचित है । अब तक तो इसे संपूर्ण रूप से राजकाज की भाषा बन जाना चाहिए था, परंतु दुर्भाग्‍यवश आज भी अंग्रेजी ही शासन-प्रशासन की मुख्‍य भाषा बनी हुई है । हिंदी के नाम पर केवल पाखंड, झूठ, फर्जीवाड़ा और नाटक होता है I हिंदी की गंगा झूठी रिपोर्टों, निरर्थक बैठकों और खोखले आयोजनों के भ्रमजाल में भटककर रह गई है I विगत आठ दशकों से हिंदी का रथ अपने प्रस्थान बिंदु पर ही ठहरा हुआ है या नौ दिन चले अढाई कोस की उक्ति को चरितार्थ कर रहा है I हर वर्ष हिंदी के मेले लगते हैं, उत्सव आयोजित होते हैं, देश-विदेश का भ्रमण होता है और फाइलों, रिपोर्टों व फाइव स्टार होटलों में हिंदी की गंगा लहराती रहती है I हिंदी के नाम पर राष्ट्रीय-अंतर्राष्ट्रीय नाट्य महोत्सव, तमाशे आदि आयोजित होते हैं, लेकिन हिंदी वास्तविक रूप में अभी तक राजभाषा नहीं बन सकी है I उपन्यासकार ने हिंदी के नाम पर चलनेवाले तमाशे पर नश्तर चलाया है I उपन्यासकार ने नाम लिए बिना बिहार निवासी पूर्व रेल मंत्री के झूठ और पाखंड की सर्जरी की है I रेलमंत्री ने दावा किया था कि प्रबंधन के बल पर रेलवे को कमाऊ विभाग बना दिया गया है जो सफ़ेद झूठ था I

   ‘लिफ़ाफ़े में कविता’ में कवि सम्मेलनों के बहाने कवियों के नैतिक तापमान का लेखा-जोखा प्रस्तुत किया गया है I यह साहित्यकारों और कवियों के नैतिक पतन, धनलिप्सा और काम कुंठा का दस्तावेज है I उपन्यास में मंचीय कवियों के चाल, चरित्र और चेहरे को बेपर्दा किया गया है I उपन्यास के पात्र कल्पना लोक के निवासी नहीं, बल्कि ये आम जन-जीवन से लिए गए हैं I इसलिए इन पात्रों में सभी मानवोचित दुर्बलताएं और स्खलन मौजूद हैं I यह औपन्यासिक कृति यथार्थ जीवन से अनुप्राणित है I अरविंद तिवारी के पास भाषा और अनुभव की पूँजी है तथा उनमें कथा का तानाबाना बुनने का कौशल है I यह उपन्यास पाठकों को गुदगुदाता है, उत्तेजित करता है और कुछ सोचने के लिए विवश करता है I उपन्यासकार ने शब्दों के हथौड़ों से कवियों को लहूलुहान कर दिया है I इन्होंने सामान्य शब्दों को ब्रह्मास्त्र बनाकर मंचीय कवियों को क्षत-विक्षत कर दिया है I रोचकता और कथात्मकता इस उपन्यास का प्राण तत्व है I उपन्यासकार ने इस उपन्यास में आम बोलचाल के शब्दों का प्रयोग किया है I इसलिए कथा में प्रवाह और संप्रेषणीयता है I उपन्यास की भाषा सहज–सरल और शैली बोधगम्य है I निष्कर्ष रूप में कहा जा सकता है कि यह उपन्यास कवियों के बहाने हिंदी साहित्य के पतन से पाठकों का साक्षात्कार कराता है I

पुस्तक-लिफाफे में कविता

लेखक-अरविंद तिवारी

प्रकाशक-प्रतिभा प्रतिष्ठान, नई दिल्ली

वर्ष-2021

पृष्ठ-192

मूल्य-400/-

*वीरेन्द्र परमार

जन्म स्थान:- ग्राम+पोस्ट-जयमल डुमरी, जिला:- मुजफ्फरपुर(बिहार) -843107, जन्मतिथि:-10 मार्च 1962, शिक्षा:- एम.ए. (हिंदी),बी.एड.,नेट(यूजीसी),पीएच.डी., पूर्वोत्तर भारत के सामाजिक,सांस्कृतिक, भाषिक,साहित्यिक पक्षों,राजभाषा,राष्ट्रभाषा,लोकसाहित्य आदि विषयों पर गंभीर लेखन, प्रकाशित पुस्तकें :1.अरुणाचल का लोकजीवन 2.अरुणाचल के आदिवासी और उनका लोकसाहित्य 3.हिंदी सेवी संस्था कोश 4.राजभाषा विमर्श 5.कथाकार आचार्य शिवपूजन सहाय 6.हिंदी : राजभाषा, जनभाषा,विश्वभाषा 7.पूर्वोत्तर भारत : अतुल्य भारत 8.असम : लोकजीवन और संस्कृति 9.मेघालय : लोकजीवन और संस्कृति 10.त्रिपुरा : लोकजीवन और संस्कृति 11.नागालैंड : लोकजीवन और संस्कृति 12.पूर्वोत्तर भारत की नागा और कुकी–चीन जनजातियाँ 13.उत्तर–पूर्वी भारत के आदिवासी 14.पूर्वोत्तर भारत के पर्व–त्योहार 15.पूर्वोत्तर भारत के सांस्कृतिक आयाम 16.यतो अधर्मः ततो जयः (व्यंग्य संग्रह) 17.मणिपुर : भारत का मणिमुकुट 18.उत्तर-पूर्वी भारत का लोक साहित्य 19.अरुणाचल प्रदेश : लोकजीवन और संस्कृति 20.असम : आदिवासी और लोक साहित्य 21.मिजोरम : आदिवासी और लोक साहित्य 22.पूर्वोत्तर भारत : धर्म और संस्कृति 23.पूर्वोत्तर भारत कोश (तीन खंड) 24.आदिवासी संस्कृति 25.समय होत बलवान (डायरी) 26.समय समर्थ गुरु (डायरी) 27.सिक्किम : लोकजीवन और संस्कृति 28.फूलों का देश नीदरलैंड (यात्रा संस्मरण) I मोबाइल-9868200085, ईमेल:- bkscgwb@gmail.com