सामाजिक

सोशल मीडिया की बनावटी चमक और हमारे मानसिक सुकून का पतन

आज के इस चकाचौंध भरे डिजिटल दौर में इंसान अपनी सच्ची ज़िंदगी जीने के बजाय दूसरों की बनावटी चमक-धमक वाली दुनिया का क़ैदी बन चुका है। सोशल मीडिया के रंगीन पर्दों पर हम रोज़ाना उन तस्वीरों और स्टोरीज़ का सिलसिला देखते हैं, जहाँ लोग अपनी ज़िंदगियों को आकर्षक और संतुष्ट दिखाने में मशगूल रहते हैं,लक्ज़री कारों में सवार मुस्कुराते चेहरे, विदेशी समुद्र तटों पर धूप में चमकते शरीर, या भव्य पार्टियों की चमचमाती फोटोज़। ये दृश्य अनजाने में हमें अपनी सादा और शांतिपूर्ण ज़िंदगी को बेहद फ़ीकी, बेरंग और बेकार नज़र आने पर मज़बूर कर देते हैं। लेकिन यह हक़ीक़त का सिर्फ़ एक पहलू है, जिसे बड़ी चालाकी और सलीक़े से पेश किया जाता है।क्या आपने कभी सोचा है कि कोई व्यक्ति अपनी असफ़लताओं को क्यों छिपाता है? अपनी बेबसी की उन रातों को क्यों पोस्ट नहीं करता, जब तन्हाई में आँखों से गरम आँसू लुढ़कते हैं? या उन संघर्षों को क्यों नज़रअंदाज़ कर देता है, जो उसके चेहरे पर झुर्रियाँ खींचते हैं? हक़ीक़त यह है कि सोशल मीडिया पर साझा होने वाली हर पोस्ट एक फ़िल्टर्ड कैनवास है,जहाँ सिर्फ़ ख़ुशियाँ और सफ़लताएँ चमकती हैं, वो हिस्सा जो दूसरों के दिल में ईर्ष्या पैदा करे। उदाहरण के तौर पर, कोई दोस्त इंस्टाग्राम पर अपनी शादी की भव्य तस्वीरें अपलोड करता है, लेकिन उसके पीछे की कर्ज़ की मार या पारिवारिक तनावों का ज़िक्र कहाँ? हम अपनी पूरी ज़िंदगी उसके उतार-चढ़ाव समेत का मुक़ाबला इन चंद ‘हाइलाइटेड’ लम्हों से करने लगते हैं। यही मुक़ाबला हमारे मानसिक सुकून के लिए एक ख़ामोश ज़हर बन जाता है, जो धीरे-धीरे हमारी आत्मविश्वास को चाट डालता है।

मनोवैज्ञानिक अध्ययनों से भी यही साबित होता है। एक रिसर्च के मुताबिक, रोज़ाना सोशल मीडिया पर दो घंटे से ज़्यादा समय बिताने वाले युवाओं में डिप्रेशन और चिंता के मामले 27% तक बढ़ जाते हैं। क्यों? क्योंकि हमारी दिमाग़ी संरचना तुलना पर आधारित है। जब हम दूसरों की चमक को अपनी हक़ीक़त से तौलते हैं, तो एक हीन भावना जन्म ले लेती है। सोचिए, आपकी सादगी भरी शाम परिवार के साथ चाय की चुस्कियाँ लेना किसी स्टारबक्स कैफ़े की ग्लैमरस फ़ोटो के आगे फ़ीकी कैसे पड़ जाती है? हर चमकती चीज़ हक़ीक़त में वैसी सुनहरी नहीं होती, जैसी स्क्रीन पर नज़र आती है। अपनी ज़मीनी सच्चाइयों को किसी और के बनावटी दिखावे की तराज़ू में तौलना, दरअसल अपनी ख़ुशियों का गला घोंटने के बराबर है।

इसलिए, अगर हम वाक़ई आत्मिक और मानसिक शांति चाहते हैं, तो दूसरों के दिखावे से प्रभावित होना छोड़ना होगा। हमें अपनी ज़िंदगी के छोटे-छोटे आशीर्वादों की क़द्र करनी होगी सुबह की पहली किरण, बच्चों की हँसी, या शाम की शांतिपूर्ण सैर। सुकून की असली संपत्ति दूसरों की नज़रों में लोकप्रिय होने में नहीं, बल्कि अपनी सच्चाई के साथ संतुष्ट होकर जीने में छिपी है। इसके लिए व्यावहारिक क़दम उठाएँ,सोशल मीडिया का इस्तेमाल सीमित करें, ‘डिटॉक्स’ पीरियड रखें, और  आदत डालें जहाँ अपनी उपलब्धियों को नोट करें। वरना यह बनावटी दुनिया हमें सिर्फ़ हसरतों और हीनभावना के सिवा कुछ नहीं देगी एक ख़ालीपन, जो हमारी रूह को खोखला कर देगा।आइए, आज से ही अपनी स्क्रीन को बंद करें और अपनी असली ज़िंदगी को गले लगाएँ। यही है सच्चा सुकून।

— डॉ. मुश्ताक अहमद शाह

डॉ. मुश्ताक़ अहमद शाह

पिता का नाम: अशफ़ाक़ अहमद शाह जन्मतिथि: 24 जून जन्मस्थान: ग्राम बलड़ी, तहसील हरसूद, जिला खंडवा, मध्य प्रदेश कर्मभूमि: हरदा, मध्य प्रदेश स्थायी पता: मगरधा, जिला हरदा, पिन 461335 संपर्क: मोबाइल: 9993901625 ईमेल: dr.m.a.shaholo2@gmail.com शैक्षिक योग्यता एवं व्यवसाय शिक्षा,B.N.Y.S.बैचलर ऑफ़ नेचुरोपैथी एंड योगिक साइंस. बी.कॉम, एम.कॉम बी.एड. फार्मासिस्ट आयुर्वेद रत्न, सी.सी.एच. व्यवसाय: फार्मासिस्ट, भाषाई दक्षता एवं रुचियाँ भाषाएँ, हिंदी, उर्दू, अंग्रेज़ी रुचियाँ, गीत, ग़ज़ल एवं सामयिक लेखन अध्ययन एवं ज्ञानार्जन साहित्यिक परिवेश में रहना वालिद (पिता) से प्रेरित होकर ग़ज़ल लेखन पूर्व पद एवं सामाजिक योगदान, पूर्व प्राचार्य, ज्ञानदीप हाई स्कूल, मगरधा पूर्व प्रधान पाठक, उर्दू माध्यमिक शाला, बलड़ी ग्रामीण विकास विस्तार अधिकारी, बलड़ी कम्युनिटी हेल्थ वर्कर, मगरधा साहित्यिक यात्रा लेखन का अनुभव: 30 वर्षों से निरंतर लेखन प्रकाशित रचनाएँ: 2000+ कविताएँ, ग़ज़लें, सामयिक लेख प्रकाशन, निरन्तर, द ग्राम टू डे, दी वूमंस एक्सप्रेस, एजुकेशनल समाचार पत्र (पटना), संस्कार धनी (जबलपुर),जबलपुर दर्पण, सुबह प्रकाश , दैनिक दोपहर,संस्कार न्यूज,नई रोशनी समाचार पत्र,परिवहन विशेष,समाचार पत्र, घटती घटना समाचार पत्र,कोल फील्ड मिरर (पश्चिम बंगाल), अनोख तीर (हरदा), दक्सिन समाचार पत्र, नगसर संवाद, नगर कथा साप्ताहिक (इटारसी) दैनिक भास्कर, नवदुनिया, चौथा संसार, दैनिक जागरण, मंथन (बुरहानपुर), कोरकू देशम (टिमरनी) में स्थायी कॉलम अन्य कई पत्र-पत्रिकाओं में निरंतर रचनाएँ प्रकाशित प्रकाशित पुस्तकें एवं साझा संग्रह साझा संग्रह (प्रमुख), मधुमालती, कोविड, काव्य ज्योति, जहाँ न पहुँचे रवि, दोहा ज्योति, गुलसितां, 21वीं सदी के 11 कवि, काव्य दर्पण, जहाँ न पहुँचे कवि (रवीना प्रकाशन) उर्विल, स्वर्णाभ, अमल तास, गुलमोहर, मेरी क़लम से, मेरी अनुभूति, मेरी अभिव्यक्ति, बेटियां, कोहिनूर, कविता बोलती है, हिंदी हैं हम, क़लम का कमाल, शब्द मेरे, तिरंगा ऊंचा रहे हमारा (मधुशाला प्रकाशन) अल्फ़ाज़ शब्दों का पिटारा, तहरीरें कुछ सुलझी कुछ न अनसुलझी (जील इन फिक्स पब्लिकेशन) व्यक्तिगत ग़ज़ल संग्रह: तुम भुलाये क्यों नहीं जाते तेरी नाराज़गी और मेरी ग़ज़लें तेरा इंतज़ार आज भी है (नवीनतम) पाँच नए ग़ज़ल संग्रह प्रकाशनाधीन सम्मान एवं पुरस्कार साहित्यिक योगदान के लिए अनेक सम्मान एवं पुरस्कार प्राप्त पाठकों का स्नेह, साहित्यिक मंचों से मान्यता मुश्ताक़ अहमद शाह जी का साहित्यिक और सामाजिक योगदान न केवल मध्य प्रदेश, बल्कि पूरे हिंदी-उर्दू साहित्य जगत के लिए गर्व का विषय है। आपकी लेखनी ने समाज को संवेदनशीलता, प्रेम और मानवीय मूल्यों से जोड़ा है। आपके द्वारा रचित ग़ज़लें और कविताएँ आज भी पाठकों के मन को छूती हैं और साहित्य को नई दिशा देती हैं।