कविता

फ्लैट संस्कृति

बड़े शहरों में फ्लैट संस्कृति
अब घरों में देहरी नहीं होती!

जिसे देख समझाया था, कभी
देहरी पार करने का मतलब,
अब घुटनों चलते बच्चे भी,
पार कर, हो जाते हैं घर से बाहर।

परिंदों की तो क्या कहें,
मनुष्यों के बोल, सुनाई नहीं देते,
मिलें किस तरह?घरों के दरवाजे
खुले दिखाई नहीं देते।

दीवारों में आले भी नहीं होते
जहां रख सकें एक उम्मीद का दिया
जो दिखा सके
भटके हुए को अंधेरे में रास्ता

अब कोई आंगन नहीं होता
जहां शादी ब्याहों में गाया जाता था
हम तो रे बाबुल,
तोरे अंगना की गैया, चिरैया

फिर भी कई बार
कैद कर दी जाती हैं, जिंदगियां
बिना खूंटे, पिंजरे के भी
संस्कारों की दुहाई देकर।

— मनु वाशिष्ठ

मनु वाशिष्ठ

c/o श्री अशोक वाशिष्ठ मंगल भवन ब्लॉक ए फ्लैट नंबर 201 बी बाल मंदिर स्कूल के पास माला रोड कोटा जंक्शन राजस्थान

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