ग़ज़ल
बात दिल की कभी कही ही नहीं,
जंग खुद से कभी लड़ी ही नहीं।
आँख रक्खी है खोलकर तो क्या,
रूह तो नींद से जगी ही नहीं।
ढूँढना चाही लाख पर हमको,
आदमीयत कहीं मिली ही नहीं।
वो वहाँ रोज़ याद करते हैं,
एक हिचकी यहाँ चली ही नहीं।
बेसबब ढो रहे हैं, सब साँसें,
ज़िंदगी, ज़िंदगी रही ही नहीं।
ख़ुद कहा ‘जय’ ने मार दे मुझको,
मौत आगे मगर बढ़ी ही नहीं।
— जयकृष्ण चांडक “जय’
