ज़िंदगी आजकल
मानवता नहीं है इंसान की जिंदगी में,
आज़माने लगी ज़िंदगी आजकल।
सम्मान देते नहीं माँ, पिता को कुछ,
दिल दुखाने लगी ज़िंदगी आजकल।
चारोंओर भ्रष्टाचार का बोलबाला है,
खौफ़ खाने लगी ज़िंदगी आजकल।
हिचकियाँ आ रही याद तुमने किया,
नाम लाने लगी ज़िंदगी आजकल।
बेवफ़ा वो नहीं हम करें जो वफ़ा,
प्यार पाने लगी ज़िंदगी आजकल।
आजकल वो लबों से कुछ भी बोलते,
झूठ भी सच लगे ज़िंदगी आजकल।
देख हमको लिखे मुक्तकें -शायरी
गुनगुनाने लगी ज़िंदगी आजकल।
मौसम अब खुशनुमा हो गया है यहां,
मुस्कुराने लगी है ज़िंदगी आजकल।
प्रेम सबके जीवन में होना ही चाहिए,
खुशियों बरसात , जिंदगी आजकल।
— कालिका प्रसाद सेमवाल
