बारिश की बूंदे
बारिश की बूंदों को जलाना आ गया
क्या कहें उनको भी हराना आ गया
तीखे शब्द मेरे, पन्ने झेल नहीं पाए और
जेठ के महीने में भी सावन आ गया
गलियों को बहुत कुछ कहना आ गया
यादों के भँवर में उलझाना आ गया
पात्र बदले होंगे पर डूब नहीं पाए और
कहीं किसी को याद अफ़साना आ गया
अंत की सीढ़ी चढ़ी आरम्भ आ गया
टूटकर जुड़ने का स्वावलंब आ गया
लोहे की सांकले पिघल नहीं पाई और
सोने को तपाने का प्रारंभ आ गया
— सौम्या अग्रवाल
