कुर्सियों का किला
कुर्सियों का किला बनाया,
घर के बीचों-बीच।
तीनों बच्चे खेल रहे थे,
खुशियाँ लेकर नीड़।
कुशन रखकर छत बना ली,
दीवारें भी चार।
छोटा-सा वह घर लग रहा,
जैसे सुंदर द्वार।
कोई राजा, कोई रानी,
कोई वीर जवान।
अपनी-अपनी भूमिका में,
मगन हुए नादान।
बाहर खड़ी बड़ी बहना,
देख रही मुस्काय।
छोटे दोनों किले के अंदर,
बैठे आँखें फैलाय।
खेल-खेल में सीख रहे थे,
मिलकर रहना साथ।
प्रेम, हँसी और अपनापन ही,
जीवन की है बात।
हँसी-ठिठोली, सपने, मस्ती,
इनका यही जहान।
कुर्सियों के इस किले में,
बसता है बचपन महान।
— डॉ. प्रियंका सौरभ
