सुगंध अहसास की
हर वर्ष की भांति इस बार भी माहेश्वरी जी अनाथ कन्याओं के कन्यादान का पुनीत कार्य कर रही थीं। विवाह का अनुष्ठान गतिमान था। वे कन्यादान स्वरूप दी जाने वाली राशि लेने के लिए भीतर आईं।
अलमारी में राशि रखने के लिए वे लिफाफे खोज ही रही थीं कि अचानक कपड़ों के पीछे दबी एक पुरानी तस्वीर उनके हाथ लगी। तस्वीर में वे दोनों हाथों में रची गाढ़ी सोंधी मेहंदी को निहारते हुए मंद-मंद शरमा रही थीं। उस एक पल में मानो वक्त ठहर गया और बीता हुआ अतीत जीवंत हो उठा। मेहंदी का एक-एक फूल उनके प्रेम के उन सुनहरे पलों की कहानी बयाँ कर रहा था। उन्हें याद आया कॉलेज का वह आखिरी साल, जब ‘अविनाश’ से उनकी पहली मुलाकात हुई थी। वह सादगी भरा पहला प्यार, छुप-छुप कर लाइब्रेरी के पीछे मिलना, जीवन भर साथ निभाने की खाई गई कसमें-वादे और फिर दोनों परिवारों की रजामंदी से हुई वह खूबसूरत सगाई। सब कुछ किसी हसीन ख्वाब जैसा था। विवाह की तारीख तय हो चुकी थी, हाथों में अविनाश के नाम की मेहंदी सज चुकी थी, लेकिन विधाता को कुछ और ही मंजूर था। शादी से ठीक दो दिन पहले एक सड़क हादसे ने अविनाश को उनसे हमेशा के लिए छीन लिया। वह शहनाइयों की गूंज पल भर में चिर वियोग के सन्नाटे में बदल गई।
पुरानी यादों के इस झोंके से माहेश्वरी जी की आँखें पथरा सी गईं। हाथों की वह मेहंदी तो कब की मिट चुकी थी, किंतु अविनाश के प्रेम की सुगंध आज भी उनके दिल में उतनी ही ताज़ा थी। वही सुगंध उन्हें हमेशा अपने प्रिय के साथ होने का अहसास कराती थी।
अब वे जब भी किसी नव-नवेली दुल्हन के हाथों में मेहंदी रची देखती हैं, तो उन्हें उसमें अपने अधूरे ख्वाब नजर आते हैं। वे उस कन्या के सपनों को पंख देने और उन्हें पूरा करने में तन-मन से जुट जाती हैं। उनके लिए मेहंदी मात्र सुहाग का रंग या सौभाग्य का प्रतीक नहीं है, बल्कि अपने उस अधूरे अनुराग को दूसरों की खुशियों में पूरा करने का एक पवित्र प्रयास है।
— डाॅ अनीता पंडा ‘अन्वी’
