ग़ज़ल
अपना गिरेबाँ ज़रा तुम बचाओ,
किसी पर न ऐसे अँगुली उठाओ।।
तुम भी हो गुजरे उन्हीं बस्तियों से,
किसी के ना मुँह पर कालिख लगाओ।1।
खूबसूरत है चेहरा जिसे है सँवारा,
मुखौटा तनिक-सा अपना हटाओ।2।
सजायी है तुमने अदालत जो अपनी,
कभी कोई तोहमत खुद पर लगाओ।3।
एक पल में उसे कह दिया चोर तुमने
ना अपनी नज़र को ही मुंसिफ बताओ।4।
तुमने हरदम तलाशीं ज़माने में कमियाँ,
खूबियाँ बढ़ उठे गर जो अपनी घटाओ।5।
हमसे ही तुमको है दुनिया ने जाना,
‘शरद’ को ना अपनी नज़र से गिराओ।6।
— शरद सुनेरी
