गीतिका/ग़ज़ल

ग़ज़ल

हर पल हसीन होता, इक यादगार होता
गर मेरी ज़िंदगी में तेरा शुमार होता

रख लेती पास अपने, सब ग़म समेट कर मैं
तू कुल जहां की ख़ुशियों का दावे’दार होता

ये मतलबी ज़माना आता न बीच में जो
न मैं ज़ार-ज़ार रोती, न तू बेक़रार होता

कर देती ख़र्च ख़ुद को, तेरे इक इशारे पर ही
मेरी वफ़ा पे तुझको यदि ए’तबार होता

चल देती साथ तेरे, साँसें समेट कर फिर
गर अपनी ज़िंदगी पर मेरा इख़्तियार होता

— पूनम माटिया

डॉ. पूनम माटिया

डॉ. पूनम माटिया दिलशाद गार्डन , दिल्ली https://www.facebook.com/poonam.matia poonam.matia@gmail.com