कविता

आदिवासी मूलनिवासी

जल,जंगल और जमीन के
असली मालिक,
आपकी दुर्गति के कारण हैं
खुद को सभ्य कहने वाले
असभ्य,बर्बर,
नोचकर संपत्ति बनाने वाले
वो लोग जो
आज भी लगे हैं
अपनी उसी जुगत में,
धर्म,संस्कृति,आविष्कार
और विकास की बात करते हुए,
ले आये हैं
धरती को विनाश के कगार पर,
एक दिन वे भी मारे जायेंगे
अपनी अकड़ के साथ ही,
और हां अपनी लालसा की सजा
प्रकृति द्वारा दिलवाएंगे
सभी जीवों को व
धरतीपुत्रों को भी।

— राजेन्द्र लाहिरी

राजेन्द्र लाहिरी

पामगढ़, जिला जांजगीर चाम्पा, छ. ग.495554

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