गीतिका/ग़ज़ल

ग़ज़ल

आसन को लगा जानो, निज कमियाँ पहचानो।
बाहर मत भागो तुम, अंतस भी तुम जानो।।

क्या गुण हैं तुम्हारे ही, झाँको तुम रूह में ही।
ढूँढ़ो अपने सब अवगुण, देखो अपने तुम वानो।।

उड़ना मत इधर-उधर, हो ठिकाना भी एक ही।
मन होता है चंचल जो, लगामें तुम तानो।।

पथ हो पथरीला जो, काँटे भी हटाना है।
बाहर मत भागो अब, दृढ़ निश्चय तुम ठानो।।

तुम जो रहो अकेले ही, तभी ध्यान लगाना।
एकाग्र हृदय से सोच, जीने के ढंग जानो।।

— रवि रश्मि ‘अनुभूति’

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