चंदा मामा से अदालत तक पहुँचा ‘बूर’
“चंदा मामा दूर के, पुए पकाएँ बूर के”—बचपन की दुनिया में शायद ही कोई ऐसी लोरी हो, जिससे भारतीय पीढ़ियों की इतनी गहरी स्मृति जुड़ी हो। माँ की गोद, नींद से बोझिल आँखें, चाँद को मामा मानने की कल्पना और मीठे पुओं की तस्वीर—इन सबको समेटे यह पंक्ति केवल गीत नहीं, बल्कि भारतीय लोकजीवन की एक सांस्कृतिक स्मृति है। ऐसे में ‘बूर’ शब्द के अर्थ को लेकर उठा विवाद हमें केवल एक शब्द पर बहस करने का अवसर नहीं देता, बल्कि यह सोचने को विवश करता है कि भाषा को हम किस दृष्टि से देखते हैं—शब्दकोश की संकीर्ण परिभाषा से या उसके ऐतिहासिक, क्षेत्रीय और सांस्कृतिक संदर्भ से?
भारत की भाषायी विविधता इतनी व्यापक है कि एक ही शब्द अलग-अलग प्रदेशों में बिल्कुल अलग अर्थ रख सकता है। उच्चारण बदलता है तो अर्थ बदल सकता है, बोली बदलती है तो भाव बदल सकता है और समय बदलता है तो शब्द का अर्थ भी बदल सकता है। यही कारण है कि किसी शब्द का वर्तमान अर्थ उसके हर ऐतिहासिक या क्षेत्रीय प्रयोग का प्रमाण नहीं हो सकता। ‘बूर’ या ‘बूरा’ उत्तर भारत की कई बोलियों में चीनी के महीन चूर्ण या तगार के अर्थ में लंबे समय से प्रयुक्त होता रहा है। पुए, लड्डू और अन्य पारंपरिक मिठाइयों के संदर्भ में इसका प्रयोग सहज और स्वाभाविक है। इसलिए यदि किसी दूसरे क्षेत्र में इसी ध्वनि वाले शब्द का कोई आपत्तिजनक अर्थ प्रचलित है, तो उस अर्थ को पूरी लोरी पर आरोपित कर देना भाषायी संदर्भ के साथ न्याय नहीं होगा।
लोकगीतों और लोरियों का संसार लिखित शब्दकोशों से कहीं पुराना है। वे पीढ़ियों की जुबान से आगे बढ़ते हैं और उनके शब्दों का अर्थ उस लोकसमाज की संस्कृति और जीवन-पद्धति में निहित होता है, जहाँ वे जन्म लेते हैं। “चंदा मामा दूर के” भी इसी लोकपरंपरा से जुड़ी लोरी है, जिसे बाद में 1955 की हिंदी फिल्म ‘वचन’ के माध्यम से व्यापक लोकप्रियता मिली। इस प्रकार एक लोकधुन और लोकभावना ने सिनेमा के रास्ते करोड़ों लोगों की स्मृति में स्थायी स्थान बनाया। इसे केवल आज के किसी स्थानीय शब्दार्थ के चश्मे से देखना उस सांस्कृतिक यात्रा को नजरअंदाज करना होगा।
भाषा का इतिहास बताता है कि शब्द स्थिर नहीं होते। वे यात्राएँ करते हैं, भाषाएँ बदलते हैं, संस्कृतियाँ बदलते हैं और उनके साथ उनके अर्थ भी बदलते रहते हैं। संस्कृत से प्राकृत, अपभ्रंश और आधुनिक भारतीय भाषाओं तक तथा अरबी, फारसी, तुर्की, अंग्रेजी और फ्रांसीसी जैसी भाषाओं से भारतीय भाषाओं में आए असंख्य शब्द आज इतने घुल-मिल गए हैं कि उनके विदेशी मूल का एहसास भी नहीं होता। लेकिन किसी शब्द की व्युत्पत्ति जान लेना और उसके वर्तमान अर्थ को उसी मूल अर्थ के बराबर मान लेना दो अलग बातें हैं।
‘औरत’ शब्द को ही लें। अरबी शब्द-परंपरा में ‘ʿawra’ से जुड़े अर्थों का संबंध ऐसी चीजों या शरीर के हिस्सों से रहा है जिन्हें ढकने या छिपाने योग्य माना जाता था। लेकिन भारतीय भाषाओं में आते-आते ‘औरत’ का सामान्य अर्थ महिला या स्त्री के रूप में स्थापित हो गया। आज इसका प्रयोग हिंदी के सामान्य बोलचाल से लेकर साहित्य और पत्रकारिता तक में होता है। क्या केवल इसकी ऐतिहासिक व्युत्पत्ति के आधार पर आज के हर प्रयोग को उसी पुराने अर्थ में पढ़ा जा सकता है? स्पष्टतः नहीं। यही भाषायी विकास की वास्तविकता है।
‘मैडम’ शब्द भी अर्थ-परिवर्तन और सामाजिक विकास का उदाहरण है। फ्रांसीसी ‘ma dame’ से विकसित यह संबोधन मूलतः सम्मानपूर्वक किसी महिला के लिए प्रयुक्त होता था। इतिहास के अलग-अलग चरणों में इसके अलग सामाजिक प्रयोग हुए, लेकिन आज अंग्रेजी और भारतीय भाषाओं में ‘मैडम’ शिक्षिका, अधिकारी या किसी सम्मानित महिला के संबोधन के रूप में सामान्यतः इस्तेमाल होता है। इसलिए किसी शब्द के इतिहास के किसी एक चरण को पकड़कर उसके वर्तमान अर्थ को परिभाषित करना भाषाविज्ञान की जटिलता को सरल निष्कर्ष में बदल देना होगा।
असल प्रश्न यह नहीं है कि किसी शब्द का किसी स्थान पर कोई दूसरा अर्थ है या नहीं। प्रश्न यह है कि क्या हर शब्द को उसके हर संभावित अर्थ के आधार पर हर संदर्भ में पढ़ा जाएगा? यदि ऐसा होने लगे तो लोकभाषा, साहित्य, लोकगीत और पुरानी कहावतों का बड़ा हिस्सा आज की शब्दार्थ-व्यवस्था में संदिग्ध बना दिया जाएगा। एक शब्द का अर्थ संदर्भ से निकलता है और संदर्भ की उपेक्षा अर्थ को विकृत कर सकती है।
न्यायालयों और सार्वजनिक संस्थानों के सामने आने वाले ऐसे भाषायी मामलों में इसलिए केवल शब्द का अर्थ देखना पर्याप्त नहीं है। शब्द किस भाषा या बोली से आया, किस समय इस्तेमाल हुआ, किस क्षेत्र में उसका क्या अर्थ रहा, रचना का उद्देश्य क्या था और उस वाक्य में उसका संदर्भ क्या है—इन सभी पहलुओं पर विचार जरूरी है। भाषायी संवेदनशीलता का अर्थ यह नहीं कि हर संभावित आपत्तिजनक अर्थ को हर जगह लागू कर दिया जाए। वास्तविक संवेदनशीलता तो यह है कि हम अलग-अलग भाषायी समुदायों के अर्थ-संसार का सम्मान करें।
यह विवाद एक बड़ा सामाजिक सबक भी देता है। आज डिजिटल माध्यमों और त्वरित प्रतिक्रियाओं के दौर में किसी शब्द का एक अर्थ खोज लेना आसान है, लेकिन उसके इतिहास और संदर्भ को समझना कठिन। इंटरनेट हमें शब्द का अर्थ तुरंत बता सकता है, मगर यह जरूरी नहीं कि वह हमें उस शब्द की पूरी सांस्कृतिक यात्रा भी समझा दे। इसलिए ‘गूगल पर ऐसा अर्थ मिलता है’ किसी भाषायी निष्कर्ष का अंतिम प्रमाण नहीं हो सकता। व्युत्पत्ति, ऐतिहासिक प्रयोग, क्षेत्रीय शब्दकोश और संदर्भ—इन सबको साथ रखकर ही भाषा को समझा जा सकता है।
लोकभाषा को आधुनिक संवेदनशीलता से टकराने के बजाय संवाद का अवसर बनाना चाहिए। यदि किसी क्षेत्र में ‘बूर’ का कोई दूसरा अर्थ लोगों को असहज करता है, तो उस क्षेत्रीय संवेदना को समझना चाहिए; लेकिन उसी आधार पर सदियों पुरानी लोरी की सांस्कृतिक स्मृति पर प्रश्नचिह्न लगाना भी उचित नहीं होगा। भाषा का सौंदर्य इसी बहुलता में है कि एक ही ध्वनि अलग-अलग जगहों पर अलग अर्थों की दुनिया खोल सकती है।
शब्दों को कठघरे में खड़ा करने से पहले उनके संदर्भ को कठघरे में खड़ा करके देखना चाहिए। क्या उस शब्द का उद्देश्य अपमान था? क्या उसका प्रयोग अश्लील भाव में हुआ था? या वह किसी लोकपरंपरा, भोजन, प्रकृति, रिश्ते अथवा सांस्कृतिक प्रतीक का हिस्सा था? इन प्रश्नों के उत्तर के बिना केवल शब्द देखकर निर्णय लेना भाषा के साथ जल्दबाजी होगी।
“चंदा मामा दूर के, पुए पकाएँ बूर के” में भारतीय बच्चे को दिखाई देता है—दूर आसमान में चमकता चाँद, मामा का आत्मीय रिश्ता और मीठे पुओं की कल्पना। यही उसका सांस्कृतिक संदर्भ है। इस संदर्भ को छोड़कर केवल एक शब्द के दूसरे अर्थ को पकड़ लेना उस पूरी लोक-स्मृति को गलत चश्मे से देखने जैसा होगा।
भाषा नदी की तरह है—बहती रहती है, रास्ते बदलती है, किनारे बदलती है और अपने साथ नए अर्थ लेकर आगे बढ़ती है। किसी शब्द को उसके वर्तमान अर्थ में बाँध देना उतना ही कठिन है जितना नदी को एक ही किनारे में रोक देना। इसलिए जरूरत शब्दों से डरने की नहीं, उन्हें समझने की है; लोकभाषाओं को संदेह की नजर से देखने की नहीं, उनकी विविधता को स्वीकार करने की है। आखिर शब्द अपने आप में न अच्छे होते हैं, न बुरे। अर्थ संदर्भ से बनता है, भाव प्रयोग से और संवेदना समझ से। कबीर की पंक्तियाँ इसी मानवीय समझ की याद दिलाती हैं—“हम-तुम दोनों एक हैं, कहन-सुनन को दोय। मन से मन को तौलिये, दो मन कबहुँ न होय॥” शब्दों के विवाद से ऊपर उठकर यदि हम उनके पीछे छिपे इतिहास, संस्कृति और भाव को समझ सकें, तो भाषा केवल संवाद का माध्यम नहीं रहेगी, बल्कि विविध भारत को जोड़ने वाला सेतु भी बनेगी।
— डॉ. सत्यवान सौरभ
