राजनीति

जनविश्वास का क्षरण और लोकतांत्रिक जवाबदेही

लोकतंत्र केवल चुनावों की व्यवस्था नहीं है, बल्कि नागरिकों और राज्य के बीच विश्वास का जीवंत अनुबंध है। किसी भी लोकतांत्रिक समाज की वास्तविक शक्ति उसके संविधान, संस्थाओं और कानूनों के साथ-साथ उस भरोसे में निहित होती है, जिसके आधार पर नागरिक शासन को वैधता प्रदान करते हैं। जब यह विश्वास मजबूत होता है तो लोग कठिन परिस्थितियों में भी सरकार के आह्वानों का समर्थन करते हैं, त्याग करते हैं और राष्ट्रीय हित को व्यक्तिगत हित से ऊपर रखते हैं। परंतु जब यही विश्वास धीरे-धीरे कमजोर होने लगता है, तब समाज में एक ऐसा मौन जन्म लेता है जो किसी भी तीखे विरोध से अधिक गंभीर संकेत माना जाता है। आज भारत में कानून, शिक्षा, सामाजिक न्याय और अवसरों की निष्पक्षता को लेकर चल रही बहसें इसी व्यापक प्रश्न को सामने ला रही हैं।

पिछले कुछ वर्षों में देश ने नागरिक भागीदारी के अनेक असाधारण दृश्य देखे। महामारी के दौरान लोगों ने प्रधानमंत्री के आह्वान पर ताली और थाली बजाकर स्वास्थ्यकर्मियों के प्रति सम्मान व्यक्त किया। इसी प्रकार मालदीव विवाद के समय बड़ी संख्या में भारतीय पर्यटकों ने अपनी यात्राएँ रद्द कर राष्ट्रीय स्वाभिमान के समर्थन का संदेश दिया। ये घटनाएँ बताती हैं कि जब जनता नेतृत्व पर विश्वास करती है तो प्रतीकात्मक आह्वान भी व्यापक सामाजिक अभियान बन जाते हैं। लेकिन लोकतंत्र में प्रतीकों की सफलता स्थायी नहीं होती। समय के साथ नागरिक अपने दैनिक जीवन की वास्तविक समस्याओं को अधिक महत्व देने लगते हैं और शासन का मूल्यांकन भावनात्मक नारों के बजाय प्रशासनिक अनुभवों के आधार पर करते हैं।

इसी पृष्ठभूमि में अनुसूचित जाति एवं अनुसूचित जनजाति अत्याचार निवारण अधिनियम को लेकर चल रही बहस अत्यंत संवेदनशील है। इस कानून का मूल उद्देश्य सदियों से सामाजिक भेदभाव और हिंसा झेल रहे समुदायों को प्रभावी कानूनी संरक्षण देना है। इसमें कोई संदेह नहीं कि ऐसे संरक्षण की आवश्यकता भारतीय समाज में ऐतिहासिक अन्याय की पृष्ठभूमि में उत्पन्न हुई। दूसरी ओर कुछ नागरिक संगठन, वकील और सामाजिक समूह लगातार यह आरोप लगाते रहे हैं कि कुछ मामलों में इस कानून का दुरुपयोग व्यक्तिगत दुश्मनी या झूठे मुकदमों के लिए भी किया जाता है। यह अंतर समझना आवश्यक है कि दुरुपयोग के आरोपों का अस्तित्व और यह निष्कर्ष कि पूरा कानून व्यापक रूप से दुरुपयोग का साधन बन चुका है, दोनों एक समान बात नहीं हैं। न्याय का तकाजा यह है कि वास्तविक पीड़ितों को त्वरित संरक्षण मिले और साथ ही झूठे मामलों की निष्पक्ष जांच भी सुनिश्चित हो।

कानून का सबसे बड़ा उद्देश्य भय उत्पन्न करना नहीं बल्कि सुरक्षा प्रदान करना है। यदि किसी निर्दोष व्यक्ति को यह आशंका सताने लगे कि बिना निष्पक्ष जांच के उसका जीवन संकट में पड़ सकता है, तो व्यवस्था के प्रति उसका विश्वास कमजोर होगा। वहीं यदि कमजोर वर्गों को यह लगे कि उनके संरक्षण संबंधी कानूनों को लगातार कमजोर करने की मांग उठ रही है, तो उनमें भी असुरक्षा की भावना पैदा होगी। इसलिए समाधान किसी एक पक्ष की विजय में नहीं बल्कि ऐसी प्रक्रिया में है जो निष्पक्ष जांच, शीघ्र न्याय और झूठे आरोपों पर समान रूप से उत्तरदायित्व सुनिश्चित करे। सामाजिक समरसता का आधार प्रतिशोध नहीं बल्कि न्यायपूर्ण संतुलन है।

दूसरा बड़ा प्रश्न उच्च शिक्षा से जुड़ा है। विश्वविद्यालय केवल डिग्री देने वाले संस्थान नहीं होते, बल्कि वे भविष्य के वैज्ञानिकों, शिक्षकों, प्रशासकों और विचारकों का निर्माण करते हैं। 2026 में विश्वविद्यालय अनुदान आयोग के समानता संबंधी नए विनियमों ने देशभर में व्यापक बहस को जन्म दिया। अनेक छात्र संगठनों, शिक्षक संघों और सामाजिक संगठनों ने इन प्रावधानों का विरोध किया, जबकि सरकार और कुछ अन्य समूहों ने इन्हें भेदभाव रोकने की दिशा में आवश्यक कदम बताया। बाद में इन विनियमों पर न्यायिक समीक्षा भी शुरू हुई, जिससे स्पष्ट हुआ कि यह केवल प्रशासनिक नहीं बल्कि संवैधानिक महत्व का प्रश्न बन चुका है।

युवाओं की सबसे बड़ी चिंता अवसरों की निष्पक्षता है। एक विद्यार्थी वर्षों तक कठिन परिश्रम करता है, प्रतियोगी परीक्षाओं की तैयारी करता है और शोध या अध्यापन में अपना भविष्य देखता है। यदि उसे लगे कि नियुक्तियों, पदोन्नतियों या संस्थागत नियमों में पारदर्शिता का अभाव है, तो उसके भीतर व्यवस्था के प्रति असंतोष स्वाभाविक रूप से बढ़ता है। दूसरी ओर सामाजिक रूप से वंचित वर्गों का तर्क है कि समान अवसर केवल औपचारिक प्रतियोगिता से नहीं आते, बल्कि ऐतिहासिक असमानताओं को ध्यान में रखते हुए विशेष सुरक्षा और प्रतिनिधित्व भी आवश्यक है। यही वह बिंदु है जहाँ भारतीय लोकतंत्र को संवेदनशील संवाद की सबसे अधिक आवश्यकता है।

सामाजिक समरसता का अर्थ यह नहीं कि समाज में मतभेद समाप्त हो जाएँ। इसका अर्थ यह है कि मतभेद हिंसा, घृणा और अविश्वास में परिवर्तित न हों। दुर्भाग्य से आज सार्वजनिक विमर्श में किसी भी मुद्दे को तुरंत जातीय, राजनीतिक या वैचारिक खेमों में बाँट देने की प्रवृत्ति बढ़ी है। सामाजिक माध्यमों ने संवाद की गति तो बढ़ाई है, परंतु कई बार उन्होंने आधी अधूरी सूचनाओं और भावनात्मक प्रतिक्रियाओं को भी व्यापक बना दिया है। परिणामस्वरूप कानून, शिक्षा और न्याय जैसे जटिल विषय भी नारेबाजी तक सीमित हो जाते हैं। लोकतंत्र को इससे सबसे बड़ा नुकसान यह होता है कि तर्क की जगह आरोप और समाधान की जगह ध्रुवीकरण ले लेता है।

हाल में राजस्थान के शहरी निकाय चुनावों ने भी यही संकेत दिया कि स्थानीय चुनाव केवल नगर परिषदों या नगर निगमों का चुनाव नहीं होते, बल्कि वे जनता की तत्कालीन प्राथमिकताओं का दर्पण बन जाते हैं। चुनाव परिणामों में भारतीय जनता पार्टी सबसे बड़ी पार्टी के रूप में उभरी, लेकिन स्वतंत्र उम्मीदवारों की उल्लेखनीय सफलता और कई क्षेत्रों में कड़े मुकाबले ने यह भी दिखाया कि स्थानीय मुद्दे मतदाताओं को प्रभावित कर रहे हैं। कुछ संगठनों ने दावा किया कि यूजीसी विनियमों के विरोध ने स्वतंत्र उम्मीदवारों को समर्थन दिलाया, जबकि अन्य दलों ने अनुसूचित जाति और जनजाति समुदायों की नाराजगी को प्रमुख कारण बताया। ये सभी राजनीतिक दावे हैं और इन्हें उसी रूप में देखा जाना चाहिए। चुनाव परिणाम यह अवश्य बताते हैं कि मतदाता अब स्थानीय प्रशासन, शिक्षा, रोजगार और सामाजिक न्याय जैसे मुद्दों पर अधिक सक्रियता से निर्णय ले रहे हैं।

लोकतंत्र में नागरिक का मौन अत्यंत अर्थपूर्ण होता है। हर असंतोष सड़कों पर दिखाई दे, यह आवश्यक नहीं। कई बार लोग अपनी प्रतिक्रिया चुनाव, जनसुनवाई, न्यायालय या सामाजिक विमर्श के माध्यम से व्यक्त करते हैं। इसलिए किसी भी सरकार के लिए यह समझना आवश्यक है कि लोकप्रियता स्थायी नहीं होती और विपक्ष के लिए भी यह भ्रम उचित नहीं कि हर असंतोष स्वतः सत्ता परिवर्तन में बदल जाएगा। लोकतांत्रिक उत्तरदायित्व का अर्थ है कि शासन लगातार जनता की बदलती अपेक्षाओं को समझे और विपक्ष रचनात्मक विकल्प प्रस्तुत करे।

आज मध्यम वर्ग, ग्रामीण समाज, अनुसूचित समुदाय, युवा विद्यार्थी और रोजगार की तलाश में लगे लाखों परिवार अलग अलग कारणों से व्यवस्था से अपेक्षाएँ रखते हैं। कोई सुरक्षा चाहता है, कोई सम्मान, कोई निष्पक्ष अवसर और कोई शीघ्र न्याय। इन सभी अपेक्षाओं को एक दूसरे के विरुद्ध खड़ा कर देना लोकतंत्र की सबसे बड़ी भूल होगी। सामाजिक न्याय और योग्यता परस्पर विरोधी अवधारणाएँ नहीं हैं। यदि नीतियाँ पारदर्शी हों, प्रक्रियाएँ निष्पक्ष हों और संस्थाएँ उत्तरदायी हों, तो दोनों के बीच संतुलन स्थापित किया जा सकता है।

न्यायपालिका की भूमिका भी इसी संदर्भ में महत्वपूर्ण हो जाती है। जब किसी कानून या विनियम पर व्यापक विवाद उत्पन्न होता है, तब न्यायालय संवैधानिक मूल्यों की कसौटी पर उसकी समीक्षा करता है। यह प्रक्रिया लोकतंत्र की कमजोरी नहीं बल्कि उसकी शक्ति है। नागरिकों को भी चाहिए कि वे हर विवाद का समाधान केवल राजनीतिक नारों में न खोजें, बल्कि संवैधानिक संस्थाओं और तथ्य आधारित विमर्श पर भरोसा बनाए रखें। लोकतंत्र में असहमति देशद्रोह नहीं और समर्थन अंधभक्ति नहीं होता। दोनों के बीच विवेकपूर्ण नागरिकता ही लोकतांत्रिक संस्कृति का आधार है।

आर्थिक विकास, वैश्विक प्रतिष्ठा और तकनीकी प्रगति निश्चित रूप से किसी भी राष्ट्र की उपलब्धियाँ हैं, किंतु इनका वास्तविक अर्थ तभी है जब सामान्य नागरिक स्वयं को सुरक्षित और सम्मानित महसूस करे। एक परिवार के लिए उसके बच्चे की शिक्षा, रोजगार और न्याय की उपलब्धता किसी भी बड़े राष्ट्रीय विमर्श से अधिक महत्वपूर्ण होती है। यदि शासन इन मूल प्रश्नों का संवेदनशील समाधान प्रस्तुत करता है तो विश्वास स्वतः मजबूत होता है। यदि इन प्रश्नों की अनदेखी होती है तो प्रतीकात्मक अभियान भी धीरे-धीरे प्रभाव खोने लगते हैं।

भारत का लोकतंत्र अपनी विविधता के कारण अद्वितीय है। यहाँ जाति, भाषा, धर्म, क्षेत्र और आर्थिक स्थिति की असंख्य परतें हैं। इसलिए किसी भी नीति का मूल्यांकन केवल राजनीतिक लाभ या हानि से नहीं बल्कि उसके सामाजिक प्रभाव से किया जाना चाहिए। अनुसूचित समुदायों की सुरक्षा भी उतनी ही आवश्यक है जितनी निर्दोष नागरिकों के अधिकारों की रक्षा। समानता के प्रयास भी उतने ही महत्वपूर्ण हैं जितनी योग्यता और पारदर्शिता। यही संतुलन सामाजिक समरसता की वास्तविक आधारशिला है।

अंततः लोकतंत्र की सबसे बड़ी परीक्षा चुनाव जीतने में नहीं बल्कि विश्वास बनाए रखने में होती है। विश्वास कानून से भी बड़ा नैतिक पूंजी है। इसे न तो भय से अर्जित किया जा सकता है और न प्रचार से सुरक्षित रखा जा सकता है। यह केवल न्यायपूर्ण प्रशासन, निष्पक्ष संस्थाओं, पारदर्शी नीतियों और नागरिक सम्मान से निर्मित होता है। आज आवश्यकता किसी नए विभाजन की नहीं, बल्कि ऐसे संवाद की है जिसमें हर वर्ग स्वयं को सुना हुआ महसूस करे। यही संवाद भारत की सामाजिक समरसता को सुदृढ़ करेगा और लोकतंत्र को उसकी वास्तविक शक्ति प्रदान करेगा।

— महेन्द्र तिवारी

महेन्द्र तिवारी

जन्म : फरवरी 1971, भोजपुर (बिहार) शिक्षा : स्नातकोत्तर (अर्थशास्त्र), डॉ. भीमराव अंबेडकर विश्वविद्यालय, आगरा सेवाएं : भूतपूर्व वायुसैनिक एवं वर्तमान में राष्ट्रीय अभिलेखागार, नई दिल्ली में कार्यरत कृतियाँ : विभिन्न समाचार पत्र-पत्रिकाओं में अब तक सैकड़ों लेख, कविताएँ और कहानियाँ प्रकाशित। संपादन : ‘दि ग्राम टुडे’ लघुकथा विशेषांक (अतिथि संपादक) प्रकाशन : कहानी संग्रह - एक लेखक का पुनर्जन्म (शीघ्र प्रकाश्य) मोबाइल : (+91) 9989703240 ई-मेल : mahendratone@gmail.com

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