कविता

सोच पर पहरा

अंधेरे रास्तों पर जब भरम का जाल होता है,
वहां चेतना का हर एक सवाल बेहाल होता है,
दुआओं के भरोसे जो भरोसे को गंवा बैठे,
उन्हीं के वास्ते फिर ज़िंदगी जंजाल होता है,
मसीहा बन के आते हैं यहां कुछ लूटने वाले,
दिलों में खौफ का वो बीज बोकर कूटने वाले,
दिखाकर मोक्ष का रस्ता,तुम्हें लाचार करते हैं,
तुम्हारी सोच पर,तुम्हारी अक्ल पर वार करते हैं,
जगाओ चेतना अपनी,उठो अब आंख को खोलो,
जो सच है सामने,तुम बेझिझक उस सच को अब बोलो,
सलामत सोच रखनी है तो शंका से डरो मत तुम,
बिना सोचे किसी के सामने यूं ही झुको मत तुम,
उसी दिन टूटती है हर गुलामी की यहां बेड़ी,
कदम जब तर्क के रस्ते बढ़ाती है नई पीढ़ी,
समझ लो बात यह वरना सदा अंधेर छाया है,
जिन्होंने सच छुपाया,बस उन्होंने राज पाया है,
याद रखियेगा जरूर कि,
तार्किकता से दूर भागने वाला समाज
हमेशा गुलामी ओढ़े रहेगा,
कभी किसी धर्म का,
कभी तथाकथित चमत्कारियों का,
कभी मदमस्त पाखंडी बाबाओं का।

— राजेन्द्र लाहिरी

राजेन्द्र लाहिरी

पामगढ़, जिला जांजगीर चाम्पा, छ. ग.495554