वे लोग आज भी जिंदा हैं
वे लोग आज भी जिंदा हैं
अवशिष्ट आयु को लेकर
अंधेरा को लालटेन दिखाकर,
वे अब भी आगे बढ़ रहे हैं
उनके आंखों के गहरे गड्ढे में
आज़ भी सपने भरें हुए हैं
वो निर्विघ्न से हंस सकते हैं
अपने पीले दांतों को दिखाकर !
वे मेहनत को पूजते हैं
मिट्टी से सोना बनाने कि
वे हुनर भी रखते हैं ,
पसीना तो नहीं रक्त का धोल
जो धूप को पीठ दिखाकर
बंजर जमीन में वहा देते हैं
खुद को जलाकर आग में
वे देश को आगे बढ़ाते हैं!
अजगर जैसे आगे बढ़ाते
गगन चुमती अट्टालिका,रास्ते
वह हथेली रेखा घिसें हुए
देश कि भविष्य लिख रहे हैं
सपने बेहिसाब बुन रहे हैं
वे लोग आज भी जिंदा हैं!
गुम हैं भुख खाली कटोरी में
छड आया नींद सोने के बिस्तर में
छुपा रहे हैं दर्द मासूम आंखों में
भरकर सुखा अंगार हाथ में
धूप ,छांव ,बारिश एक समान
न डरकर खाई,काटें, गड्ढे
वे आगे बढ़ते रहते हैं !
कैसे जिन्दा है वोह लोग
कोई कभी नहीं पुछता हैं
फूटी वास्तविकता में लिखा भाग्य
खाली पेट में एक मुठ्ठी दीर्घश्वास
किसी का कुछ नहीं जाता है
वैसे ही देख रहा निर्लज्ज आसमान
मिट्टी पी जाती सारे आंसु और रक्त
वे लोग आज भी जिंदा हैं !
— सस्मिता राउत
