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त्योहार की खुशियाँ, धरती की कीमत : कितना जरूरी, कितना दिखावा?

दीपावली प्रकाश, प्रसन्नता, स्वच्छता और आपसी प्रेम का पर्व है। इस अवसर पर घर सजते हैं, दीप जलते हैं, मिठाइयाँ बाँटी जाती हैं और परिवारों में खुशियाँ आती हैं। लेकिन त्योहारों के बीच एक ऐसे प्रदूषण पर भी ध्यान देना जरूरी है, जो पटाखों के धुएँ और शोर से आगे बढ़कर हमारी खरीदारी, सजावट, पैकेजिंग और भोजन की बर्बादी से जुड़ा है। प्रदूषण की पूरी कहानी केवल पटाखों तक सीमित नहीं है; अनावश्यक उपभोग भी पर्यावरण पर दबाव बढ़ाता है।
जरा सोचिए, घर में पर्याप्त कपड़े, सजावट का सामान और उपयोगी वस्तुएँ होने के बावजूद दीपावली आते ही हमें नया सामान खरीदने की इच्छा क्यों होने लगती है? बाजार की छूट, ऑनलाइन ऑफर और विज्ञापन हमें बार-बार खरीदारी के लिए प्रेरित करते हैं। धीरे-धीरे आवश्यकता पीछे छूट जाती है और खरीदना ही उत्सव का हिस्सा बन जाता है। जबकि प्रत्येक नई वस्तु के निर्माण में कच्चा माल, पानी, ऊर्जा और श्रम लगता है। उसके बाद पैकेजिंग और परिवहन भी पर्यावरणीय प्रभाव बढ़ाते हैं। जिस वस्तु की हमें जरूरत ही नहीं, उसके निर्माण में खर्च हुए संसाधनों की भी शायद आवश्यकता नहीं थी।
ऑनलाइन खरीदारी ने जीवन को सुविधाजनक बनाया है, लेकिन अनावश्यक ऑर्डर और बार-बार सामान लौटाने की आदत नई चुनौतियाँ पैदा कर सकती है। अलग-अलग पैकेट, अतिरिक्त पैकिंग और बार-बार होने वाला परिवहन संसाधनों की खपत बढ़ाते हैं। मुफ्त डिलीवरी ग्राहक के लिए भले ही मुफ्त हो, लेकिन उसके पीछे ईंधन, वाहन और श्रम की लागत होती है। इसी तरह मुफ्त रिटर्न की सुविधा का बार-बार उपयोग अतिरिक्त परिवहन और पैकेजिंग की जरूरत पैदा कर सकता है। इसलिए खरीदने से पहले वस्तु का आकार, गुणवत्ता और वास्तविक उपयोग जाँच लेना समझदारी है।
त्योहारों पर उपहार देना हमारी सुंदर परंपरा है। समस्या उपहार देने में नहीं, बल्कि उसे महँगा और भव्य बनाने की होड़ में है। दूसरों के घर की सजावट देखकर वैसी ही सजावट खरीदना या महँगे उपहारों के माध्यम से अपनी प्रतिष्ठा दिखाना अनावश्यक उपभोग को बढ़ाता है। क्या रिश्तों की गहराई उपहार की कीमत से तय होती है? घर पर बनी मिठाई, पुस्तक, पौधा या स्नेह से लिखा संदेश भी रिश्तों में उतनी ही मिठास ला सकता है। त्योहार का उद्देश्य संबंधों को मजबूत करना है, वस्तुओं का ढेर लगाना नहीं।
कपड़ों और सजावट के मामले में भी विवेक जरूरी है। हर वर्ष नए कपड़े खरीदना या केवल नई डिजाइन के आकर्षण में अच्छी स्थिति वाली झालरें बदल देना आवश्यक नहीं। कपड़ों के निर्माण में पानी, ऊर्जा और अन्य संसाधन खर्च होते हैं। इसी तरह प्लास्टिक की मालाएँ, थर्मोकोल, चमकीले रिबन और एक बार इस्तेमाल होने वाली सजावटी वस्तुएँ त्योहार के बाद कचरा बढ़ा सकती हैं। मिट्टी के दीये, फूलों की सजावट और घर में उपलब्ध वस्तुओं का रचनात्मक उपयोग उत्सव को सुंदर बना सकता है। टिकाऊ वस्तुओं को कई वर्षों तक इस्तेमाल करना और पुराने सामान का पुनः उपयोग करना अधिक जिम्मेदार विकल्प हैं।
रोशनी दीपावली की पहचान है, लेकिन बिजली और संसाधनों का विवेकपूर्ण उपयोग भी जरूरी है। ऊर्जा-कुशल एलईडी लाइटें बिजली की खपत कम करने में मदद करती हैं। खराब बल्ब, बैटरियों और इलेक्ट्रॉनिक सजावट को सामान्य कचरे में फेंकने के बजाय उचित ई-कचरा संग्रह व्यवस्था के अनुसार निपटाना चाहिए। इसी प्रकार घर की सफाई में रासायनिक उत्पादों, स्प्रे और सुगंधित पदार्थों का जरूरत से अधिक उपयोग नहीं करना चाहिए। कुछ उत्पाद घर के भीतर हवा की गुणवत्ता प्रभावित कर सकते हैं। सफाई के उत्पादों को निर्देशों के अनुसार इस्तेमाल करना, पर्याप्त वेंटिलेशन रखना और अलग-अलग क्लीनर को आपस में न मिलाना जरूरी है।
दीपावली के दौरान भोजन की बर्बादी भी एक गंभीर विषय है। मेहमानों के स्वागत में जरूरत से अधिक पकवान और मिठाइयाँ तैयार की जाती हैं, लेकिन बचा हुआ भोजन कई बार कूड़ेदान में पहुँच जाता है। हम भूल जाते हैं कि उस भोजन के उत्पादन और तैयारी में पानी, ऊर्जा, भूमि, श्रम और परिवहन लगा था। भोजन का कचरे में विघटन भी परिस्थितियों के अनुसार ग्रीनहाउस गैसों का उत्सर्जन कर सकता है। इसलिए मेहमानों की संख्या के अनुसार भोजन बनाना, बचे भोजन को सुरक्षित रखना और समय पर उपयोग करना जरूरी है। एक बार इस्तेमाल होने वाले कप-प्लेटों के बजाय पुनः उपयोग योग्य बर्तनों को प्राथमिकता देना भी कचरा कम कर सकता है।
सफाई के दौरान निकले पुराने मोबाइल, चार्जर, तार, बैटरियाँ और बल्ब भी साधारण कचरा नहीं हैं। उनका अनुचित निपटान पर्यावरण को नुकसान पहुँचा सकता है। उपयोगी वस्तुओं की मरम्मत, पुनः उपयोग और जरूरतमंदों को दान करने से कचरा कम किया जा सकता है। इसी तरह खरीदारी की सूची पहले बनाना और कई काम एक ही यात्रा में पूरे करना अनावश्यक परिवहन तथा ईंधन की खपत घटाने में मदद कर सकता है।
इन सभी समस्याओं के पीछे हमारी मानसिकता की भी भूमिका है। कई बार हम जरूरत के कारण नहीं, बल्कि दिखावे, सामाजिक दबाव या दूसरों से तुलना करने के कारण खरीदारी करते हैं। बाजार हमारी इच्छाओं को बढ़ाता है, लेकिन अंतिम निर्णय हमारे हाथ में है। हमें परंपरा और अति, सुविधा और अपव्यय तथा वास्तविक आवश्यकता और क्षणिक आकर्षण के बीच अंतर समझना होगा।
इसके लिए एक सरल तरीका अपनाया जा सकता है—देखें, पहचानें, मिलान करें और चुनें। खरीदारी से पहले देखें कि वस्तु वास्तव में जरूरी है या नहीं। पहचानें कि घर में उसका विकल्प पहले से मौजूद है या नहीं। अपने बजट और पर्यावरणीय जिम्मेदारी से उसका मिलान करें। फिर तय करें कि नया सामान खरीदना है, पुरानी वस्तु का उपयोग करना है, साझा करना है या खरीदारी छोड़ देनी है।
अंततः सवाल यह नहीं कि दीपावली पर हमने कितनी खरीदारी की, कितनी रोशनी की या कितने उपहार दिए। असली सवाल यह है कि हमारी खुशियों के पीछे कितने अनावश्यक संसाधन खर्च हुए और उत्सव के बाद हमने कितना कचरा छोड़ा। पटाखों से होने वाले प्रदूषण पर ध्यान देना आवश्यक है, लेकिन उत्पादन से लेकर निपटान तक पर्यावरण पर पड़ने वाले प्रभावों को भी समझना होगा।
दीपावली हमें अंधकार से प्रकाश की ओर जाने का संदेश देती है। आइए, इस संदेश को अपने व्यवहार में भी उतारें। दीप जलाएँ, रिश्तों में मिठास घोलें, जरूरतमंदों की सहायता करें और परंपराओं का आनंद लें—लेकिन अनावश्यक बर्बादी से बचते हुए।
इस दीपावली घर को रोशन करने के साथ अपनी सोच को भी रोशन करें। क्योंकि सच्चा उत्सव वही है, जिसमें हमारी खुशियाँ बढ़ें, लेकिन धरती पर बोझ नहीं।

— बी के शिव अरोड़ा

बी. के. शिव अरोड़ा

खंडवा, मध्य प्रदेश मोबाइल: 96851-77-0-66

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