राजनीति

फ्रांस में जनाक्रोश, व्यवस्था के सामने चुनौती

फ्रांस की राजधानी पेरिस और उसके अन्य प्रमुख शहर इन दिनों भीषण जनाक्रोश और उग्र विरोध प्रदर्शनों की आग में जल रहे हैं। कभी अपनी सुंदरता, कला और शांति के लिए विश्व भर में प्रसिद्ध यह यूरोपीय देश आज अभूतपूर्व अशांति के दौर से गुजर रहा है। सड़कों पर उतरे 4 लाख से अधिक नागरिकों का यह हुजूम सरकार की नीतियों के खिलाफ अपनी आवाज बुलंद कर रहा है। स्थिति की गंभीरता का अंदाजा इसी बात से लगाया जा सकता है कि सरकार को इस जनसैलाब को नियंत्रित करने के लिए 70 हजार से अधिक सुरक्षाकर्मियों को तैनात करना पड़ा है। हालात बेकाबू होते देख सुरक्षा बलों द्वारा प्रदर्शनकारियों पर जल तोपों और अश्रु गैस के गोलों का लगातार इस्तेमाल किया जा रहा है। यह आंदोलन अब केवल एक साधारण विरोध नहीं रह गया है, बल्कि इसने एक व्यापक राष्ट्रीय संकट का रूप ले लिया है। संपूर्ण देश का जनजीवन पूरी तरह से अस्तव्यस्त हो चुका है और हर तरफ केवल अराजकता का माहौल दिखाई पड़ रहा है।

इस विशाल जन आंदोलन की शुरुआत मुख्य रूप से शिक्षा व्यवस्था में व्याप्त भारी कमियों को लेकर हुई थी। देश के उच्चतर माध्यमिक विद्यालयों के छात्रों और शिक्षकों ने सबसे पहले व्यवस्था के खिलाफ मोर्चा खोला। उनका मुख्य असंतोष शिक्षण संस्थानों में शिक्षकों की भारी कमी और शिक्षा के क्षेत्र में किए गए वित्तीय आवंटन की कटौती को लेकर था। सरकारी आंकड़ों के अनुसार, शिक्षकों के अस्वस्थ होने या किसी कारणवश अनुपस्थित रहने पर उनके स्थान पर वैकल्पिक व्यवस्था न होने के कारण बीते शैक्षणिक सत्र में 1 करोड़ 50 लाख से अधिक शिक्षण घंटे बर्बाद हो गए। इस स्थिति ने विशेष रूप से उन क्षेत्रों के छात्रों के भविष्य को अंधकारमय कर दिया है, जहां आर्थिक रूप से कमजोर वर्ग के लोग निवास करते हैं। उचित संसाधनों के अभाव ने युवाओं के मन में एक गहरी निराशा और व्यवस्था के प्रति भारी रोष उत्पन्न कर दिया, जिसके परिणामस्वरूप उन्होंने सड़कों पर उतरकर न्याय मांगने का निर्णय लिया।

छात्रों और शिक्षकों के इस विरोध में जल्द ही देश के विभिन्न श्रमिक संघ और आम नागरिक भी शामिल हो गए। इसके पीछे का सबसे बड़ा कारण जीवन यापन की लागत में हो रही बेतहाशा वृद्धि और मुद्रास्फीति का संकट है। आम आदमी के लिए अपनी दैनिक जरूरतों को पूरा करना भी अब एक कठिन चुनौती बन गया है। आवश्यक वस्तुओं के मूल्य आसमान छू रहे हैं, जिसके कारण श्रमिक वर्ग अपने वेतन में वृद्धि और बेहतर सेवानिवृत्ति भत्ते की मांग को लेकर सड़कों पर उतर आया है। आर्थिक असमानता की खाई लगातार चौड़ी हो रही है। इसी बीच, पीले परिधान पहनने वाले वे प्रदर्शनकारी भी इस आंदोलन का हिस्सा बन गए, जो कुछ वर्ष पहले भी आर्थिक नीतियों के खिलाफ अपनी ताकत दिखा चुके थे। इन सभी वर्गों के एक साथ आ जाने से यह विरोध प्रदर्शन एक विशाल जन आंदोलन में परिवर्तित हो गया, जिसने सरकार की नींव हिलाकर रख दी है।

यह संपूर्ण जनाक्रोश वर्तमान सत्ता पक्ष और प्रशासन के प्रति गहरे अविश्वास का परिचायक है। देश के शीर्ष नेतृत्व और आम जनता के बीच एक बड़ा वैचारिक और भावनात्मक अंतराल पैदा हो गया है। नागरिकों का स्पष्ट रूप से मानना है कि सत्ता पक्ष की वर्तमान नीतियां केवल संपन्न वर्ग को लाभ पहुंचा रही हैं, जबकि मध्यम और निम्न वर्ग को उनके हाल पर बेसहारा छोड़ दिया गया है। इसी राजनीतिक असंतोष ने जनता के भीतर पल रहे गुस्से को भयानक ज्वाला में बदल दिया है। शांतिपूर्ण तरीके से शुरू हुए इस आंदोलन ने देखते ही देखते एक अत्यंत उग्र और हिंसक रूप धारण कर लिया। प्रशासनिक विफलता और जनसंवाद की कमी ने इस आग को और भड़काने का काम किया है।

पेरिस सहित देश के अन्य बड़े शहरों में हिंसा और तोड़फोड़ की घटनाएं लगातार सामने आ रही हैं। कुछ अतिवादी समूहों और मुखौटा पहने असामाजिक तत्वों ने आंदोलन की आड़ में सुरक्षा बलों पर पथराव करना, कांच की बोतलें और ज्वलनशील पदार्थ फेंकना शुरू कर दिया। भीड़ को तितर-बितर करने के लिए सुरक्षाकर्मी लगातार बल प्रयोग कर रहे हैं। सार्वजनिक संपत्तियों को भारी नुकसान पहुंचाया गया है। सड़कों पर खड़े वाहनों और कचरा पात्रों को आग के हवाले कर दिया गया। अब तक लगभग 3 हजार से अधिक व्यापारिक प्रतिष्ठानों और दुकानों में लूटपाट की घटनाएं हो चुकी हैं। अपनी आजीविका को बचाने के लिए छोटे व्यापारियों को अपनी दुकानों के आगे लकड़ी के बड़े तख्ते लगाने पड़े हैं। हर तरफ खौफ और अनिश्चितता का माहौल व्याप्त है।

सरकार द्वारा स्थिति को नियंत्रण में लाने के लिए अत्यंत कठोर कदम उठाए जा रहे हैं। सुरक्षा बलों ने अब तक 1 हजार से अधिक उपद्रवियों को हिरासत में लिया है। तलाशी अभियानों के दौरान सुरक्षाकर्मियों ने प्रदर्शनकारियों के पास से लोहे के छर्रे, ज्वलनशील सामग्री और धारदार हथियार भी बरामद किए हैं। नागरिक सुरक्षा को ध्यान में रखते हुए देश के कई हिस्सों में रात्रिकालीन निषेधाज्ञा लागू कर दी गई है। विश्व भर में प्रसिद्ध कई ऐतिहासिक संग्रहालयों और पर्यटन स्थलों को अनिश्चित काल के लिए बंद कर दिया गया है। सार्वजनिक परिवहन व्यवस्था बुरी तरह चरमरा गई है, जिससे आम जनजीवन पूरी तरह ठप हो गया है। नागरिक अपने ही घरों में कैद होने को मजबूर हो गए हैं।

फ्रांस का इतिहास जन क्रांतियों और सत्ता के खिलाफ विद्रोहों से भरा पड़ा है। वहां की जनता ने कभी भी अन्याय को मूकदर्शक बनकर स्वीकार नहीं किया है। वर्तमान का यह संकट भी उसी ऐतिहासिक परंपरा की एक कड़ी प्रतीत होता है, जहां नागरिक अपने अधिकारों की रक्षा के लिए किसी भी हद तक जाने को तैयार हैं। सरकार की हठधर्मिता और प्रदर्शनकारियों के अडिग रुख के बीच फंसा यह देश अब एक ऐसे चौराहे पर खड़ा है, जहां से आगे का रास्ता बहुत ही कठिन और अनिश्चित जान पड़ता है। प्रशासन के आला अधिकारी लगातार बैठकें कर रहे हैं, परंतु अभी तक कोई ठोस समाधान निकलकर सामने नहीं आया है। सत्ता पक्ष के लोग शांति की अपील कर रहे हैं, लेकिन जब तक जमीनी स्तर पर जनता की वास्तविक समस्याओं का निराकरण नहीं किया जाता, तब तक इन अपीलों का कोई विशेष प्रभाव होता हुआ नहीं दिखाई दे रहा है।

आर्थिक मोर्चे पर देश की स्थिति दिनोंदिन चिंताजनक होती जा रही है। खाद्य पदार्थों, ईंधन और दैनिक उपयोग की वस्तुओं के दामों में हुई भारी वृद्धि ने आम नागरिक की कमर तोड़ कर रख दी है। श्रमिक संघों का आरोप है कि सरकार की नीतियां बड़े उद्योगपतियों और बहुराष्ट्रीय कंपनियों के पक्ष में बनाई गई हैं, जबकि पसीना बहाने वाले मजदूर वर्ग को हाशिए पर धकेल दिया गया है। वेतन वृद्धि की मांग को लेकर विभिन्न औद्योगिक क्षेत्रों के कर्मचारियों ने काम का बहिष्कार कर दिया है। कारखानों में उत्पादन ठप हो गया है और आपूर्ति श्रृंखला पूरी तरह से टूट चुकी है। ऊर्जा और परिवहन क्षेत्र के कर्मचारियों के भी हड़ताल पर चले जाने से पूरा देश एक प्रकार से रुक सा गया है, जिसका सीधा असर देश की अर्थव्यवस्था पर पड़ रहा है।

अंतर्राष्ट्रीय स्तर पर भी फ्रांस की इस आंतरिक कलह की व्यापक चर्चा हो रही है। मानवाधिकार संगठनों ने सुरक्षा बलों द्वारा किए जा रहे अत्यधिक बल प्रयोग पर गहरी चिंता व्यक्त की है। उनका तर्क है कि लोकतंत्र में विरोध प्रदर्शन करना जनता का मौलिक अधिकार है और इसे दबाने के लिए सैन्य शक्ति का उपयोग नहीं किया जाना चाहिए। हालांकि, सरकार का तर्क है कि वह केवल उन असामाजिक तत्वों के खिलाफ कार्रवाई कर रही है, जो राष्ट्रीय संपत्ति को नुकसान पहुंचा रहे हैं और कानून व्यवस्था के लिए खतरा बन गए हैं। विदेशी पर्यटकों ने अपनी यात्राएं रद्द कर दी हैं, जिससे पर्यटन उद्योग को भारी आर्थिक नुकसान उठाना पड़ रहा है। यह उद्योग देश की अर्थव्यवस्था का एक बहुत बड़ा और महत्वपूर्ण हिस्सा माना जाता है।

इस संपूर्ण घटनाक्रम से यह स्पष्ट होता है कि बल प्रयोग के माध्यम से इस समस्या का कोई स्थायी समाधान नहीं निकाला जा सकता। सत्ताधारी दल को अपने अहंकार को किनारे रखकर सभी प्रमुख हितधारकों, जैसे कि श्रमिक संघों, छात्र नेताओं और नागरिक समाज के प्रतिनिधियों के साथ खुले मंच पर संवाद स्थापित करना होगा। केवल एक सार्थक और पारदर्शी बातचीत ही इस गतिरोध को तोड़ सकती है। नीतियां बनाते समय समाज के अंतिम पायदान पर खड़े व्यक्ति के हितों को ध्यान में रखना नितांत आवश्यक है। यदि सत्ता और जनता के बीच पनपी इस अविश्वास की खाई को समय रहते नहीं पाटा गया, तो यह वहां के लोकतांत्रिक ढांचे के लिए अत्यंत घातक सिद्ध हो सकता है। यह पूरा घटनाक्रम विश्व के अन्य लोकतांत्रिक देशों के लिए भी एक कड़ा सबक है कि जनता की आवाज को लंबे समय तक दबाया या अनसुना नहीं किया जा सकता।

— महेन्द्र तिवारी

महेन्द्र तिवारी

जन्म : फरवरी 1971, भोजपुर (बिहार) शिक्षा : स्नातकोत्तर (अर्थशास्त्र), डॉ. भीमराव अंबेडकर विश्वविद्यालय, आगरा सेवाएं : भूतपूर्व वायुसैनिक एवं वर्तमान में राष्ट्रीय अभिलेखागार, नई दिल्ली में कार्यरत कृतियाँ : विभिन्न समाचार पत्र-पत्रिकाओं में अब तक सैकड़ों लेख, कविताएँ और कहानियाँ प्रकाशित। संपादन : ‘दि ग्राम टुडे’ लघुकथा विशेषांक (अतिथि संपादक) प्रकाशन : कहानी संग्रह - एक लेखक का पुनर्जन्म (शीघ्र प्रकाश्य) मोबाइल : (+91) 9989703240 ई-मेल : mahendratone@gmail.com

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