राजनीति

विश्वविद्यालयों को अशांत करने की राजनीति

देश के विश्वविद्यालय एक बार फिर अशांत हो रहे हैं। यह अशांत हो रहे हैं या फिर किये जा रहे हैं यह तो जांच का विषय है लेकिन हालात लापरवाही के कारण वाकई चिंताजनक हो गये हैं जिसका लाभ सत्ता समर्थक विद्यार्थी परिषद तो कतई नहीं उठा पा रही है अपितु उसे विश्वविद्यालयें में घटने वाली सभी घटनाओं से हानि उठानी पड़ रही है। चुनावों में हार-जीत तो लगी रहती है लेकिन आजकल भारत की राजनीति में एक बड़ी विचित्र बात यह हो गयी है कि भारत के किसी भी कोने में यदि कोई भी चुनाव हो रहा होता है तो उसके परिणामों को मोदी सरकार व राज्य सरकार की लोकप्रियता से जोड़कर देखा जा रहा है तथा फिर सभी दल उसी आधार पर आगे की रणनीति तय करने के लिए जुट जाते हैं। कहा जाता है कि विश्वविद्यालय राजनीति सीखने की पहली पाठशाला होते है। यही कारण है कि आजकल छात्रसंघ चुनाव परिणामों की महत्ता को भी लोकतंत्र के उसी तराजू में तौला जा रहा है।
अभी हाल ही में देश के कई विश्वविद्यालयें व डिग्री कालेजों में छात्रसंघ चुनाव हुए जिसमें भाजपा व संघ समर्थित विद्यार्थी परिषद को पराजय का सामना करना पड़ा है। राजस्थान विश्वविद्यालय,असम उसके बाद जेएनयू, दिल्ली विश्वविद्यालय तथा फिर हैदराबाद विश्वविद्यालय में विद्यार्थी परिषद की पराजय से विरोधी छात्र संगठनों के हौसले बुलंद हो गये हैे। अब यही लोग देश के अन्य विश्वविद्यालयों को भी फतह करने के लिए राजनैतिक साजिशों का ताना बाना भी बुनने लग गये हैैं। विश्वविद्यालयों में विद्यार्थी परिषद की पराजय को धर्मनिरपेक्ष छात्र संगठन व तथाकथित सेकुलर मीडिया ने अपने हिसाब से जनता के बीच सुर्खिंया बनाकर परोसा है। जेएनयू में कम्युनिस्टों की जीत व उसके बाद दिल्ली विवि में दो पदों में कांग्रेस समर्थित उम्मीदवारों की जीत से कांग्रेस व अन्य दलों का मनोबल बढ़ना स्वाभाविक ही था। यह वहीं जेएनयू है जहां कम्युनिस्टों की नयी पौध ने ”हमको चाहिए आजादी“ के नारे लगाये थे और देशभर के विश्वविद्यालयों का वातावरण अशांत कर दिया था। देश के सभी मोदी विरोधी दलों व नेताओं ने इन नारों का समर्थन करके अपनी राजनैतिक गोंटियां भी सेंक ली थीं।
बड़े ही आश्चर्य की बात है कि विश्वविद्यालयों में हमको चाहिए आजादी का नारा जीत रहा है और राष्ट्रवाद पराजय की ओर जा रहा है। विश्वविद्यालयों में विद्यार्थी परिषद की पराजय से सेकुलर खेमें को राहत की सांस ही नहीं मिल रही है अपितु अब इस खेमे को यह बल भी मिल रहा है कि 2019 के लोकसभा चुनावों में यही छात्र उनकी नैया पार लगा सकते हैं। पीएम नरेंद्र मोदी अपने हर भाषण में युवाओं का उल्लेख अवश्य करते हैं। युवाओं के विकास के लिए नित नये आयाम पेश कर रहे हैं तथा स्किल इंडिया जैसे कार्यक्रमों व अन्य योजनाओं का बखान कर रहे हैं। लेकिन ऐसा प्रतीत हो रहा है कि विश्वविद्यालय के युवाओं को उनके कार्यक्रम पसंद नहीं आ रहे हैं या फिर राष्ट्रवाद की हाईडोज अन्य छात्र समुदाय को पसंद नहीं आ रही है। यह भी हो सकता है कि सत्ता में रहने के कारण छात्रों के बीच विद्यार्थी परिषद के छात्रों के बीच जो जुझारू तेवर होते थे वह अहंकार व गुंडई के कारण गायब हो गये हों। ऐसा नहीं है कि विश्वविद्यालयों में विद्यार्थी परिषद का हर छात्र नेता साफ सुथरे व राष्ट्रवादी चरित्र का है। विश्वविद्यालयों में विद्यार्थी परिषद की पराजय को हलके में नहीं लिया जा सकता और न ही छोड़ा जा सकता है क्योंकि अब भाजपा विरोधी दलों ने इन्हीं चुनाव परिणामों के सहारे आगे की रणनीति का ताना बाना बुनना शुरू कर दिया है। सोशल मीडिया व टी वी चैनलों में इस बात की खूब चर्चा की गयी। जेएनयू व दिल्ली में विद्यार्थी परिषद की पराजय के बाद विश्वविद्यालयों व भाजपा विरोधी मीडिया में ऐसा जश्न मनाया गया जैसे कि इन लोगों ने मोदी की सत्ता को उखाड़कर फेंक दिया हो।
अब यही कारण है इन सभी दलों के छात्र संगठनों ने उप्र में भी छात्र संघ चुनाव कराने के लिए आंदोलन छेड़ दिया है। बसपा नेत्री मायावती ने देश के कई विश्वविद्यालयों में विद्यार्थी परिषद की पराजय को देश में राजनैतिक बदलाव का शुभ संकेत बताया है। उन्होंने कहा कि अब भाजपा नेताओं को उनके बुरे दिन दिखाने का मन जनता बनाती जा रही है। उन्होंने यहां तक कहा कि हैदराबाद में विद्यार्थी परषिद की हार वास्तव में दलित छात्र रोहित वेमुला को सच्ची श्रद्धांजलि है। इससे साफ पता चल रहा है कि अब यह सभी दल छात्रों के कंधे पर अपनी बंदूक रखकर अपनी राजनीति व निहित स्वार्थों को साधने का काम करने जा रहे हैें। रोहित वेमुला प्रकरण पर केंद्र सरकार ने जो जांच आयोग बिठाया था उसकी रिपोर्ट आ चुकी है लेकिन ऐसा प्रतीत हो रहा है कि हैदराबाद में छात्रसंघ चुनावों के दौरान विद्यार्थी परिषद उस आयोग की रिपोर्ट को अपने हित में भुनाने में नाकाम रहा। इस समय विद्यार्थी परिषद विश्वविद्यालयों में गहरे दबाव में है तथा साथ ही कई विश्वविद्यालयों में परिषद को हराने के लिए राष्ट्रीय फलक की तर्ज पर गठबंधन भी किये जा रहे हैं। आज विश्वविद्यालयों में कोई भी छोटी-मोटी घटना घट जाती है तो उसे कम्युनिस्ट तथा अन्य सेकुुलर छात्र संगठन अपने हित में साधने के लिए लग जाते हैं।
अभी हाल ही में उप्र में वाराणसी विश्वविद्यालय में छात्रा के साथ छेड़छाड़ की शर्मनाक घटना घटी लेकिन प्रशासन की लापरवाही के चलते वह एक घटना जिसमें तुरंत एक्शन लेकर पीड़िता के पक्ष में कार्यवाही की जा सकती थी, लेकिन प्रशासनिक लापरवाही के कारण यह घटना बेहद बड़ी होती चली गयी और इस घटना की आढ़ में अन्य सभी दलों ने अपनी राजनैतिक रोटियां भी सेंकनी प्रारम्भ कर दीं। अब प्रथमदृष्टा यह साफ हो गया है कि बीएचयू की घटना के पीछे वहां का प्रशासन ही दोषी है तथा वहां पर लापरवाह अधिकारियों पर कार्यवाही भी की जा रही है तथा पीएम मोदी का संसदीय क्षेत्र होने के कारण केंद्र सरकार व मुख्यमंत्री योगी कड़ेे तेवरों के साथ घटना पर नजर रखे हैं।
बीएचयू की घटना ने कई प्रश्नचिन्ह भी खड़े कर दिये है कि आखिर जिस प्रदेश का मुख्यमंत्री इतने सख्त तेवर कानून व्यवस्था के प्रति अपना रखे हों तथा विश्वविद्यालय प्रशासन को पहले से एलर्ट जारी किया गया हो उस समय बीएचयू जैसे एक विश्वविद्यालय में छात्रा के साथ छेड़छाड़ की जाती है, शिकायत के बाद भी कोई कार्यवाही नहीं की जाती तथा उसके बाद छात्रायें अपनी सुरक्षा की मांगों के साथ धरने पर बैठ जाती हैं। इस बीच घटनाक्रम तेजी से घूमता हे और पीएम मोदी के दौरे के समय ही छात्राओं पर लाठीचार्ज कर दिया जाता है जिसके बाद वहां पर हिंसा और आगजनी हो जाती है।
लेकिन इस बीच धरने पर बैठी छात्राओं को यह बात भी समझ में आ जाती है कि उनके आंदोलन को बाहर से अराजक तत्वों ने हाइजैक कर लिया और हिंसा व उपद्रव करके बीएचयू की अस्मिता को तार-तार कर दिया। बीएचयू का घटनाक्रम जिस तरह से चला वह पूरी तरह से पहले तो सुनियोजित प्रतीत हुआ लेकिन यह बात भी बिलुकल सही निकली है विश्वविद्यालय प्रशासन पूरी तरह से लापरवाह था। यदि कुलपति या कोई अन्य अधिकारी छात्राओं से धरनास्थल पर आकर बात कर लेता तो यह मामला इतना न बिगड़ता। फिलहाल बीएचयू की घटना से विरोधी दलों के हौसले एक बार फिर बुलंद हो गये है तथा योगी सरकार की कार्यक्षमता पर सवालिया निशान उठा रहे हैं तथा अब बीकएचयू की घटना को पूरे प्रदेश ही नहीं अपितु दूसरे प्रदेंशो में भी भुनाने की तैयारी कर ली है।
उप्र के सभी विरोधी दल अब इस मुददे को नगर निकाय चुनावों में पूरी ताकत के साथ उठायेंगे। बीजेपी सरकार को लोकतंत्र का हत्यारा करार दिया जायेगा। यह भी कहा जायेगा कि यूपी सरकार समाज के सभी लोगों की आवाज को दबा रही है। किसान, छात्र, महिला, दलित व अल्पसंख्यक सभी का उत्पीड़न किया जा रहा है। इन्हीं बातों के साथ छात्रसंघ चुनावों की मांग एक बार फिर जोर पकड़ रही है कारण साफ है कि बीएचयू की घटना के विद्यार्थी परिषद विरोधी सभी छात्र संगठनों व इकाईयो को एक गर्मागर्म मुददा मिल गया हैं।
इस बीच एक बात और सामने आ रही है कि विश्वविद्यालयों में नकरारात्मक राजनीति की विपरीत धारा बहाने वाले राजनैतिक दलों की इकाईयां अब विद्यार्थी परिषद को हराने के लिए गठबंधन की राजनीति कासहारा लेने लग गयी हंैं। आगामी छात्रसुघ चुनावों में बीएचयू एक मुख्य मुददा बनेगा तथा गठबंधन करके विद्यार्थी परिषद को पराजित करने के बाद केंद्र में मोदी सरकार के खिलाफ एक वातावरण बनाने की कृत्रिम साजिशें रची जायेंगी। बीएचयू में जिस प्रकार से घटना घटी वह एक शर्मनाक घटना थी तथा उसके बाद जो कुछ हुआ वह लापरवाही तथा अदूरदर्शिता का नतीजा था। अब विरोधी दल इस घटना को गोरखपुर में बच्चों की मौत की तरह उप्र के उपचुनावो में मुददा बनायेंगे। इसीलिए अब सभी विश्वविद्यालयों को हाईएलर्ट कर दिया गया है कि छात्रसंघ चुनाव कराने की मांग की आढ़ में कोई नया उपद्रव न हो जये।
यह प्रकरण निश्चय ही बहुत जल्द शांत करने का प्रयास किया जा रहा है। यह बात भी कुछ हद तक साफ होती जा रही है कि पीएम मोदी के न्यू इंडिया मिशन व विकास के मुददे को डीरेल करने के लिए छात्रों के कंधे पर बंदूक रखकर राजनीति षुरू हो गयी है। बीच में इन्हीं दलों ने किसानों के हित के खूब मुददे उठाये थे लेकिन सफलता नही मिली अब नोटबंदी व बेनामी संपत्ति के खिलाफ कार्यवाही से परेशान लोगों ने विश्वविद्यालयों को राजनीति का अखाड़ा बना लिया है। इन लोगों को लग रहा है कि मोदी सरकार को यदि उखाड़ फेंकना है तो सबसे पहले युवाओं के बीच में पैठ बनानी होगी और वह रास्ता विश्वविद्यालयों से होकर ही जाता है। बेरोजगारी का लाभ उठाकर अशांत छात्रों को इसी प्रकार से अशांत किया जा रहा है। इन दलों के पास कोंई मुददा नहीं है। इसलिए छेड़छाड़ को ही मुददा बना लिया।
यहाुं एक बात पर और ध्यान देने की बात है कि विश्वविद्यालयों तथा लड़कियों के डिग्री कालेजों के बाहर पिछली सरकारों में छेड़छाड़ की वारदातें आम तरीके से होती थीं लेकिन तब मीडिया व अन्य लोग इतना हल्ल नहीं मचाते थे आखिर क्यों ? हालात बहुत दयनीय हो जाते थे जब लड़कियों की छुट्टी होती थी और स्कूलों के गेट के बाहर लफंगे आकर खड़े हो जाते थे कहीं यह योगी सरकार की परीक्षा लेने के लिए शातिर लोगों ने फंडिंग  के सहारे साजिश तो नहीं रच डाली और लापरवाही के कारण वह साजिश सफल हो गयी। जिसे अब विरोधी दलों ने अपने समय के हिसाब से मुददा बना लिया है। इसलिए विश्वविद्यालयों में घट रही घटनाओं की काफी गहराई के साथ न्यायिक जांच की आवश्यकता है और यूपी सरकार ने इस पर त्वरित कार्यवाही की है वह प्रशंसनीय है।

मृत्युंजय दीक्षित