कविता

सदियों के हस्ताक्षर

राम अवध में आज बिराजे
घर – घर सुमिरन होता है
सदियों के हस्ताक्षर करने
सूर्य उदय होता है।
जीवन के सोपानों पर
आज राम भी रोता है।
सिया का स्वप्न जागृत होकर
अल्पवास ही होता है
वन -वन भटके राम रघुराई
इतिहास अमर हो गाता है।
कोई भी व्यवधान प्रभु के आने से
टल जाता है।
जन्म – जन्म के कंटक सारे
यादों में धुल जाते हैं, और
अंजाना केवट प्रभु को
गंगा पार लगाता है।
भाई लक्ष्मण/भ्राता प्रभु के
आज भी पैर दबाता है
और /साथ में
सीता माता संग वन वन भटका
जाता है।
संस्कारों के बीज पलें हैं
हर घर की तरुणाई में।
बालक लव कुश आज भी
घर घर रामायण जी गाते हैं,
और माता सीता का पावन यश
दोहराते हैं।
प्रभु आज भी विरह – व्यथा के आरोही बन जाते हैं।
मन के भीतर अवध बसा है
राम बसा है कण – कण में।
जीवन सफल बनाओ,
प्रभु श्री राम अवध में आते हैं।
चरणामृत से पावन दृग जल
सींच – सींच तुलसी के राम कहलाते हैं/राम अवध में आते हैं।
प्रभु राम प्रतिष्ठा पाते हैं।

— प्रतिभा पुरोहित

प्रतिभा पुरोहित

अहमदाबाद