कविता

भाषा दिवस

अपनी – अपनी भाषा में जब,
गीत प्रेम के सबने गाये ।
हे अदृश्य अनुपम प्रभु मेरे ,
सभी समझ में तेरे आये ॥
भाव हृदय के मन से होकर,
जब वाणी से बाहर आये ।
पृथक – पृथक भाषाएं थी पर ,
सभी प्रकट तुझसे हो पाये ॥
कौआ कर्कश कोयल प्यारी,
मैना लड़ती संध्या सारी ।
भाव दिये हैं मानव ने ये,
बोली तो है सबकी प्यारी ॥
नव ताल रचो, नव गीत रचो,
नव छन्द रचो ,नव ग्रन्थ रचो ।
ये शान बनें मेरे भारत की,
ये आन बनें मेरे भारत की ।
ये जोड़ करें, ये होड़ करे,
भारत को कुछ दे जाने की॥

— देवेन्द्रपाल सिंह “बर्गली”

देवेन्द्रपाल सिंह "बर्गली"

उधमसिह नगर उत्तराखण्ड M- 9458140798