बदल रहा इंसान
बदलावों का दौर चला है, आप लीजिए जान।
जाने कैसे सबसे ज्यादा , बदल रहा इंसान।।
कलियुग के इस समरांगण में, भाँति-भाँति के लोग।
इस बदलावी महासमर से, फैल रहा है रोग।।
समझ बूझ के बिना आप क्यों, बाँट रहे हो ज्ञान।
जाने कैसे सबसे ज्यादा , बदल रहा इंसान।।
बदहाली का चहुँदिश फैला, सबसे ज्यादा शोर।
फिर भी उनको यही लग रहा, नई सुबह की भोर।।
हमको होता अभी नहीं क्यों, पहले से अनुमान।
जाने कैसे सबसे ज्यादा , बदल रहा इंसान।।
रिश्तों में नित बढ़ता जाता, अपने पन का अंत।
फिर भी हम जमकर इठलाते, कहते खुद को संत।।
कहाँ किसी को आज दे रहा, अब मानव सम्मान।
जाने कैसे सबसे ज्यादा , बदल रहा इंसान।।
आज स्वयं ही खुद को देते, धोखा सारे लोग।
बदले में हैं खूब भोगते, फैलाते जो रोग।।
कहाँ किसी का आज बचा है, दीन -धर्म-ईमान।
जाने कैसे सबसे ज्यादा , बदल रहा इंसान।।
देखा – देखी आज हो रहा, छल – प्रपंच भरपूर।
अपने ही अब होते जाते, अब अपनों से दूर।।
समझाएगा कोई मुझको, किसने गढ़ा विधान।
जाने कैसे सबसे ज्यादा, बदल रहा इंसान।।
