शिक्षा एवं व्यवसाय

सदाचार या कदाचार 

  आरंभिक शिक्षा के स्वरुप का वर्णन  गुरुकुल  में मिलता हैं,विधारम्भ संस्कार ‘ओम नमः सिद्धम’ आरम्भ कराया जाता था। वेद,व्याकरण, साहित्य, छन्द, नियुक्त, कल्पज्योंतिष,गणित और चिकित्सा पाठ्यक्रम  के विषय  को शिक्षण पद्दति में रटन्त प्रणाली के साथ-साथ, करके सिखने पर बल दिया जाता था।सह शिक्षा के वर्णन मिलते हैं कामन्ती की शिक्षा भूखिसु  देवरात के साथ होने का वर्णन मिलता है और लव-कुश के साथ ऐतरेयी की शिक्षा भी वर्णित हैं।इन सभी शिक्षाओं में शिष्यों से परिक्षा इस प्रकार इस प्रकार ली जाती थी कि शिक्षार्थी को पता भी नही चलता था और उनकी परिक्षा भी हो जाती थी।इन शिक्षाओं में शिक्षार्थी को परिक्षा के प्रति कोई डर,भय या अंक की कोई समस्या नही आती थी।
             आज की शिक्षा पद्धति में परिक्षा एक हऊआ सा डर बन गया हैं। ये परिक्षा छात्र के आनंद जीवन में काली बदली की तरह घिर जाने वाली है,और उत्तम अंक न लाने पर शिक्षको और अभिभावक के कुटिल भौहों का निशाना बनाने वाली होती है। क्या ये परिक्षा छात्रों के लिए  बिषवल्लरी है? क्या ये परिक्षा सचमुच निरर्थक और महत्वशुन्य है?
नही! मानव जीवन में परिक्षा की आवश्यकता तो है ही,यदि परिक्षा न हो तो छात्र की योग्यता का पता ही न चले। परिक्षा एक कसौटी है जिस पर खड़े और खोटे सोने की जांच होती,यह वह तराजू है जिसके द्वारा छात्रों के ज्ञान में भारीपन और हल्केपन की जांच होती।प्रतिभाहीन  क्षमताहीन बिल्कुल सामान्य व्यक्ति को ऐसा काम दिए जाए जिसमें कुशाग्र बुद्धि की आवश्यकता हो तो सब गड़बड़ हो जाएगा। समाज और सरकार का काम ठीक से नही चलेगा।   
    मनोवैज्ञानिक ने सिद्ध कर दिए कि प्रत्येक व्यक्ति की बुद्धि क्ष्मता समान नही होती।युवा मन बहुत चंचल होता है,यदि उनके उपर परिक्षा का अंकुश न हो तो वे अपना अधिकांश समय मौज-मस्ती में ही गुजारेंगे। यदि परिक्षा न हो तो फिर प्रतियोगितात्मक भावना का विकास न हो सकता। मानव मात्र के विकास से ही राष्ट्र, समाज और विश्व का विकास होता है।अतः यदि परीक्षाएँ न हो तो प्रतियोगितात्मक विकास न हो पाए न ही मनुष्य के बुद्धि को चुनौती मिलेगी,न इसके लिए वह चेष्टा करेगा ।इसका परिणाम होगा कि मानव समाज के विकास के सारे द्वार  अवरुद्ध हो जाएगें।अवीचीन युग की परिक्षा प्रणाली रटने पर अधिक बल देती हैं,छात्र न तो वर्ष भर परिश्रम करते है,न ही इनका दृष्टिकोण पढने का होता है परिणाम छात्र परिक्षा पर कदाचार का उपयोग करते हैं।
      अब प्रश्न उठता है कि परिक्षा में कदाचार के लिए दोषी कौन? इस कदाचार रुपी भ्रष्टाचार के लिए सिर्फ परीक्षार्थियों को ही दोषी नही ठहराया जा सकता।इसके लिए अभिभावक तथा हमारी शिक्षा प्रणाली भी कम दोषी नही।इन सबमें सबसे अधिक दोषी तो मैं भविष्य निर्माता शिक्षक समुदाय को ही मानती हुं।
        आए दिन अखबारों में यह देखने को मिलता है  परिक्षा के प्रश्न पत्र परिक्षा होने के पहले ही परिक्षार्थीयों के पास मौजूद रहते हैं ।मैट्रिक से लेकर स्नातकोतर, मेडिकल,इन्जीनियर के परिक्षा में कदाचार कुछ ज्यादा ही देखने को मिलता है इसमें तो शिक्षा व्यवस्था को ही दोषी ठहराया जा सकता हैं।कुछ अभिभावक भी इसमें शामिल रहते है।
हमारे यहाँ की परिक्षा प्रणाली में सुधार की आवश्यकता हैं सबसे पहले शिक्षक समुदाय को स्वयं अपने चरित्र में सुधार लाना होगा ,जिससे उन्हे शिक्षा,नैतिकता और आचरण-व्यवहार में वास्तविक विशिष्टता प्राप्त हो।परिक्षा में कदाचार सुधार के लिए आवश्यक हैं कि बाह्य परिक्षा की संख्या में कमी कर दिए जाए।तथा इन बाह्य परिक्षाओं के साथ-साथ स्कूल रिकार्ड भी रखे जाए। बाह्य एवं आन्तरिक परिक्षाओं में अंको के स्थान पर सांकेतिक चिन्ह दिए जाए।  कुछ कड़े कदमों और व्यवस्था से कदाचार मुक्त परिक्षा में सुधार लाया जा सकता है।
— सुजाता मिश्रा

सुजाता मिश्रा

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