ग़ज़ल
तजुर्बे न जाने कितने इम्तिहान लेते हैं
चलो हम ख़ुद को हारा मान लेते हैं
पकड़ता हूं हवाओं को मुट्ठी में जब
मेरे ख़ाली हाथ बुरा मान लेते हैं
अब रोने से कोई दर्द मिटते ही नहीं
ये चोट उम्रभर के निशान देते हैं
हर कोई करता है एक एहसान मुझपर
कमबख़्त झूठे झूठे इल्ज़ाम देते हैं
तुमने इस शख़्स से छीना हुनर हँसने हँसाने का
फिर भी देखो ख़ामोश चेहरा पहचान लेते हैं
मैं देता हूं रेत को कई सारे राज़
समुंदर मेरे राज़ को नुकसान देते हैं
मेरे सब्र की उमर बहुत लंबी है
तुझे पाने की क़तार में सीना तान लेते हैं
सुना है हारने वाला ही रखता है तजुर्बों का शौक़
फिर क्यों हम ख़ुद को हारा मान लेते हैं
— सेठ बनारसी
