गीतिका/ग़ज़ल

ग़ज़ल

तजुर्बे न जाने कितने इम्तिहान लेते हैं
चलो हम ख़ुद को हारा मान लेते हैं

पकड़ता हूं हवाओं को मुट्ठी में जब
मेरे ख़ाली हाथ बुरा मान लेते हैं

अब रोने से कोई दर्द मिटते ही नहीं
ये चोट उम्रभर के निशान देते हैं

हर कोई करता है एक एहसान मुझपर
कमबख़्त झूठे झूठे इल्ज़ाम देते हैं

तुमने इस शख़्स से छीना हुनर हँसने हँसाने का
फिर भी देखो ख़ामोश चेहरा पहचान लेते हैं

मैं देता हूं रेत को कई सारे राज़
समुंदर मेरे राज़ को नुकसान देते हैं

मेरे सब्र की उमर बहुत लंबी है
तुझे पाने की क़तार में सीना तान लेते हैं

सुना है हारने वाला ही रखता है तजुर्बों का शौक़
फिर क्यों हम ख़ुद को हारा मान लेते हैं

— सेठ बनारसी

प्रियांशु सेठ

मैं प्रियांशु सेठ, वाराणसी का निवासी हूं। स्वामी दयानन्द सरस्वती से प्रभावित होकर मेरी भी सम्पूर्ण ऊर्जा, बल व बुद्धि आर्ष ग्रन्थों के स्वाध्याय, लेखनी और वैदिक धर्म के प्रसार हेतु समर्पित है। धन्यवाद!