तितली
रंग बिरंगी तितलियां भला शोर कहा करती
भोरे के गुंजन से यू ही बदनाम हुआ करती
फूलों की थाली में संग पराग का रस पीती
हाथों की छुअन पंख से हथेलियों में रंग देती।
भंवरों के पास संगीत तितलियों के पास रंग आते
मौसम में जब खिले फूल तब ये मेहमान बन जाते
भंवरे ना गुनगुनाते तितलियां फूल पे ना मंडराती
वीरान से उद्यान में अब कोयल से क्यों गीत गाते।
— संजय वर्मा “दृष्टि”
