वृक्ष
तन को मारे चोट, तो मिले गहरा घाव।
बदले में पेड़ लगाओ,मिले सबको छाॅंव।।
पौधा यदि लगाओगे,मर्ज का दवा पाओगे।
हरा शीतल खूबसूरत,धरा को तुम पाओगे।।
काट रहा मानव वृक्ष,बढ़ रहा प्रतिदिन ताप।
अनैतिक कर्म का है,प्रकृति का यह श्राप।।
मृदाकण को बांध कर,रक्षा करें नद तट सारे।
करो सभी वृक्षारोपण,जिससे बाड़ सब हारे।।
धरती कर रही सब से, आज एक पुकार।
लगाओ सब एक पेड़,ना होवे दिन बेकार।।
मुझे सुरक्षा देना, नैतिक जिम्मेदारी है तुम्हारी।
पर्यावरण प्रदुषण पर,पड़ूंगा हमेशा मै भारी।।
हमें बढ़ाना व जगाना,यह काज तूं रखना जारी।
ग्लोबल वार्मिंग जैसे असुर,सहज हारेगी सारी।।
प्रकृति का अनुपम हूं,सदा मै एक वरदान।
हवा पानी का साधन,मनुज मुझे तुम जान।।
— लक्ष्मी नारायण सेन
