गीतिका/ग़ज़ल

ग़ज़ल

वो धड़कनों में समा रहे हैं
सुकूं हम अपना गंवा रहे हैं

धरा ने ओढ़ी बसंती चूनर
बहारों के मौसम आ रहे हैं

सितम उठाये थे जिनकी ख़ातिर
उन्हीं के दिल को दुखा रहे हैं

ज़हन में कोई है याद आई
के हौले से मुस्कुरा रहे हैं

छुपाए दिल में जो अब तलक थे
वो “गीत” उनको सुना रहे हैं

— प्रियंका

प्रियंका अग्निहोत्री 'गीत'

पुत्री श्रीमती पुष्पा अवस्थी

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