कविता

अपनों के सँग भूलकर, चलना नहीं कुचाल

रूठो चाहे उम्र भर, रख लो लाख मलाल।
अपनों के सँग मत कभी, चलना कुटिल कुचाल॥
साथ न चलना हो चले, अपनी-अपनी चाल।
अपनों के सँग भूलकर, चलना नहीं कुचाल॥

रिश्तों की बुनियाद है, सच्चे मन का मेल।
छल-कपट की चाल से, बिगड़े जीवन-खेल॥
विश्वासों की डोर का, रखना सदा ख़याल—
अपनों के सँग भूलकर, चलना नहीं कुचाल॥

मीठे बोलों के तले, मत रखना विष-बाण।
अपने ही जब घाव दें, रोता है सम्मान॥
टूटे फिर विश्वास का, जुड़े नहीं फिर जाल—
अपनों के सँग भूलकर, चलना नहीं कुचाल॥

धन-दौलत की चाह में, मत बाँटो परिवार।
अपने ही जब दूर हों, सूना हो संसार॥
प्रेम रहे तो घर बने, वरना सब बेहाल—
अपनों के सँग भूलकर, चलना नहीं कुचाल॥

जीत वही सच्ची कहें, जिसमें हो विश्वास।
धोखे से जो भी मिले, टिकता कब इतिहास॥
सच की राहें छोड़कर, मिलता केवल काल—
अपनों के सँग भूलकर, चलना नहीं कुचाल॥

‘सौरभ’ रिश्ते प्रेम से, पाते हैं विस्तार।
चाल नहीं, बस साथ से, खिलता है परिवार॥
अपनों का विश्वास ही, जीवन की है ढाल—
अपनों के सँग भूलकर, चलना नहीं कुचाल॥

— डॉ. प्रियंका सौरभ

*डॉ. प्रियंका सौरभ

रिसर्च स्कॉलर इन पोलिटिकल साइंस, कवयित्री, स्वतंत्र पत्रकार एवं स्तंभकार, (मो.) 7015375570 (वार्ता+वाट्स एप) facebook - https://www.facebook.com/PriyankaSaurabh20/ twitter- https://twitter.com/pari_saurabh

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