अरमान और इंतजार
जागे थे अरमान में करता रहा इंतजार,
झूम के बरसी घटाएं तन-मन पे फुहार।
आप भी आते तो कितना अच्छा होता,
हम साथ भीगते ‘मन’ प्रफुल्लित होता।
तेरी याद में खुद को तन्हा भिगो लिया,
इस तड़प का जहर मैंने खुद पी लिया।
वादा करके ना आना अच्छा तो नहीं है,
लाचार मेरे दिल को छोड़ जाना सही है?
बताओ क्या? मेरी ‘चाहत’ अधूरी सी है,
क्यों? मेरी राहों से मुंह मोड़ा मजबूरी है।
खताएं तो सबसे होती है तुमसे भी हुई,
हाँ वफाओं की कमी तुमको ही पड़ गई।
— संजय एम तराणेकर
