कविता

बड़ा अलवेला कन्हैया मेरा!

(मधुगीति 250812)

बड़ा अलवेला कन्हैया मेरा,
लगाता फेरा भव में हर वेला;
आँख तक हर की बाँकपन झाँकी,
देता झकझोर भुवन हर झांकी!

मुक्त करना चहा है हर मन को,
पंचभूतों से उठाना वह है चहे;
अटक जो जाता भाव जड़ता में,
भाव उत्तिष्ट दिए भव से तरे!

कहाँ कुछ काम उसको करने को,
प्रकृति स्वायत्त सत्ता चलने को;
दृष्टि बस रखता सब सही चलता,
सोचता जो भी जान सब लेता!

सोच सब उसकी योजना उसकी,
यंत्र जग तंत्र चेतना उसकी;
सूचना समन्वय औ संचालन,
स्मरण विस्मरण विधा उसकी!

प्रबंधक कितने निदेशक कितने,
निवेशक कितने नियामक कितने;
‘मधु’ के मालिक के कर्मी हैं कितने,
जान जो लेता होता है चेरा!

— गोपाल बघेल ‘मधु’