व्याकरण शास्त्री व साहित्यकार की दृष्टि में जीवन दर्शन
प्रस्तावनाजीवन एक रहस्यमय यात्रा है — जिसे व्याकरण शास्त्री शब्दों की संरचना में देखता है और साहित्यकार भावनाओं के प्रवाह
Read Moreप्रस्तावनाजीवन एक रहस्यमय यात्रा है — जिसे व्याकरण शास्त्री शब्दों की संरचना में देखता है और साहित्यकार भावनाओं के प्रवाह
Read Moreहर उर में तू ही छाया,हर सुर में रहा गाया;ना समझ कोई पाया,जग तेरा रहा साया! हर रूप रहा तेरा,हर
Read Moreहे नाथ सृष्टि में लाकर,तूने था क्यों भरमाया;संग रहके मेरे पल-पल,क्यों ना था गले लगाया! ना दूर रही थी मंज़िल,तू
Read Moreजिमि छोड़िकें नवजात शिशु,जाबत चरन धेनु बिपिन;तिमि काम पर जाबत युवति,आ वत्स कूँ देखन चहति! मन मारि कें जानो पड़त,सोचति
Read Moreकदाचित् मैं सृष्टा की कली हूँ,खिली खिलखिलाई ख़ुशबू दी हूँ;भ्रमरों को प्राणें का पराग दी हूँ,कालांतर में धरा धूल से
Read Moreढल गए टल गए, दिन कहाँ वे रहे,वक्त आया किए और फिर चल वे दिए;दर्द कुछ थे दिए, सर्द कुछ
Read Moreप्राण के इस पट रहा मैं,प्राण के उस पाट तुम;त्राण के इस तट रहा मैं,त्राण के उस घाट तुम! मैं
Read More(मधुगीति 250813) विचित्र चित्र तेरी चितवन का,चितेरा तू रहा है त्रिभुवन का;चित्त का अहं औ महत भव का,भाव की हर
Read Moreदीपोत्सव में अवनि पर आज,अनेक प्रदीपों के दर्शन हुए;कितने तरह के दीपकों को,कितने मानव कितनी भाँति जलाए! सुंदर सजी अवलियों
Read More