द्विज का जगत! (मधुकथा 251114) 23:05
जब भी जगत में चलते-चलते आत्म ज्ञान होजाए तो हम द्विज (द्वितीय जन्मे) हो जाते हैं! तब जीवन को नाटक
Read Moreजब भी जगत में चलते-चलते आत्म ज्ञान होजाए तो हम द्विज (द्वितीय जन्मे) हो जाते हैं! तब जीवन को नाटक
Read Moreलोक कितने विलोके हम हैं गए,अकेले फिर भी हम हैं कितने रहे;नज़ारे कितने तारे दिखलाए,नज़र कीटाणु कितने गुण आए! चुस्त
Read More(मधुगीति 250812) करोगे क्या यहाँ कला करके,पताका क्या करोगे फहराके;कपोत बनके क्यों न चल लेते,हंस बनके न क्यों विचर लेते!
Read More(मधुगीति 250812) बड़ा अलवेला कन्हैया मेरा,लगाता फेरा भव में हर वेला;आँख तक हर की बाँकपन झाँकी,देता झकझोर भुवन हर झांकी!
Read More(मधुगीति 250812) लूट जो लोगे सभी ले लेगा,लूटने भी कहाँ है वह देगा;साथ में तुम्हारा सभी लेगा,मिटा अस्तित्व तुम्हें हिय
Read More(मधुगीति 250812) दिए भटका कन्हैया भव अपने,जीव लेने लगे हैं निज सपने;गए वे भूल आए क्या करने,भूले वे आए जिसे
Read Moreआ विराजो यहाँ,छोड़ करके जहान;हृदय मेरे बसो,छेड़ मर्मर ध्वनि! है स्वचालित जगत,माया विचरा रहा;मोह वश बह रहा,कुछ किए जा रहा!
Read Moreकितना अकेला है ऊपर वाला;जगत जिसका है इतना अलवेला! बिना बात का रचा खेला;लग गया यहाँ मेला! ना कुछ लगाया
Read Moreहे राम, मैं हैरान;देखकर तेरा मकान! पाकर मुक़ाम,झाँक कर मचान;चलते तीर कमान,सब लहूलुहान! बिना इत्मीनान,ना कुछ सरोकार;ना काम ना धाम,बिन
Read Moreयाद मुद्दत से वो है आया कहाँ,गुफ्तगू प्यार की सुनाया कहाँ,जुस्तजू दिल की वह बताया कहाँ,रूबरू खुल के अभी आया
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